लखीमपुर खीरी। दहशत, आक्रोश और कवायद के बीच 30 दिन का समय बीत गया... मगर बाघ पकड़ में नहीं आया। ग्रामीणों को बाघ नजर आता है, लेकिन बेहोश करने के प्रयासों में जुटी वन कर्मियों की टीम की रेंज में बाघ नहीं आ रहा। डॉक्टर, वन कर्मियों की टीम और तमाम इंतजाम अब तक काम नहीं आए हैं।
27 जुलाई को बाघ ने हैदराबाद थाना क्षेत्र के गांव इमलिया निवासी अमरेश कुमार पर हमला कर मार डाला। परिजनों और ग्रामीणों के विरोध प्रदर्शन के बाद बाघ को पकड़ने के प्रयास शुरू हुए। कैमरे और पिंजरे लगाए गए। बेहोश कर पकड़ने की अनुमति मिल गई। डॉक्टरों की टीम भी आ गई, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस घटना के करीब 14 दिन बाद बाघ ने मूड़ा अस्सी गांव के जाकिर को मार डाला। वन विभाग प्रयास में जुटा है, मगर हाथ खाली हैं। गांवों में दहशत और आक्रोश है।
अब कर्तनिया घाट के डॉक्टर ने संभाली जिम्मेदारी
इमलिया, मूड़ा अस्सी, घरथनिया आदि गांवों में दहशत का पर्याय बने बाघ को बेहोश कर पकड़ने को पहले पीलीभीत टाइगर रिजर्व के डॉक्टर दक्ष गंगवार ने जिम्मेदारी संभाली। उनके बाद कानपुर प्राणि उद्यान के डॉक्टर ने कई दिन तक बाघ को बेहोश करने का प्रयास किया। अब डाॅ. दीपक कुमार पशु चिकित्सक कर्तनियाघाट वन्यजीव प्रभाग एवं डाॅ. दया शंकर, पशुचिकित्सक अपनी टीम के साथ निगरानी में जुटे हैं।
बाघ पकड़ने को अब तक किए गए यह इंतजाम
इमलिया गांव के पास 24 कैमरे और चार पिंजरे लगाए गए।
वन कर्मियों की चार टीमें बाघ प्रभावित क्षेत्र में निगरानी रख रही हैं।
दुधवा की दो हथिनियां सुलोचना और डायना भी अभियान में शामिल हैं।
इमलिया और मूड़ा अस्सी के पास तीन मचान बनाए गए हैं।
करीब एक सप्ताह से थर्मल ड्रोन से बाघ की लोकेशन का पता किया जा रहा है।
कानपुर प्राणि उद्यान, पीलीभीत टाइगर रिजर्व और कतर्निया घाट के डॉक्टर अलग-अलग ड्यूटी पर बाघ को बेहोश करने पहुंचे हैं।
बाघ की चहलकदमी से पड़ा यह असर
मोहम्मदी-महेशपुर रेंज के करीब 40 गांवों में बाघ की दहशत है।
बाघ की दहशत की वजह से प्रभावित गांवों के स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति घटी है।
किसानाें के फसलों में खाद-पानी आदि का काम भी प्रभावित हुआ है।
ग्रामीण, कई लोग एक साथ आवागमन करने को विवश हैं।
दक्षिण खीरी वन रेंज के अधिकांश वन कर्मी और संसाधन इस अभियान में लगे हैं।