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...यूं ही इंसानों को अपना शिकार नहीं बना रहे बाघ

Wed, 20 Jun 2018 12:36 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,लखीमपुर खीरी
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 दक्षिण खीरी वन प्रभाग के महेशपुर रेंज में कठिना नदी के किनारे खेत में सिंचाई कर रहे एक किसान की बाघ हमले की मौत के बाद बाघों के बदलते मिजाज और उसके कारणों पर सवाल उठ रहे हैं। वन विभाग भी सवालों के घेरे में है कि लगातार बाघ हमले होने के बाद भी वन विभाग कुछ भी नहीं कर पा रहा है। आखिर ऐसी कौन सी स्थितियां हैं कि बाघों को जंगल से बाहर निकलकर वन्यजीवों की अपेक्षा इंसानों और पालतू जानवरों में अपना भोजन तलाशना पड़ रहा है।
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आईवीआरआई के वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. एके शर्मा का कहना है कि बाघ कभी किसी इंसान पर अकारण हमला नहीं करता। बाघ दो स्थितियों में ही किसी इंसान पर हमला करता है या तो वह भूखा हो या इंसान चौपाए की स्थिति में हो जैसे वह झुक कर फसल काट रहा हो या झुक कर कोई काम रहा हो तब बाघ उसे चौपाया जानवर समझकर उस पर हमला करता है। बाघ जब जंगल के बाहर होता है तो वह या तो पालतू पशुओं का शिकार करता है या चौपाए की स्थिति में पाकर इंसान पर हमला करता है। अभी तक इंसानों पर बाघ के जितने भी हमले हुए हैं सभी में यही स्थिति सामने आई है।
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शिकार करने में अक्षम होने पर आदमखोर होते हैं बाघ
आईवीआरआई के डॉ. एके शर्मा का कहना है जब वन्यजीवों की अपेक्षा इंसान कम फुर्तीला होता है। इसलिए बाघ उन्हें आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। बाघ आमतौर से नरभक्षी नहीं होता। बाघ उसी दशा में आदमखोर होता है जब वह किसी कारण से फुर्तीले जानवरों का शिकार करने में अक्षम हो जाता है जैसे बुढ़ापा आना या दांत का टूट जाना अथवा पैर में दिक्कत होने से भागने में अक्षम हो तो वह आसान शिकार ढूंढता है। एक दो इंसानों का शिकार करने के बाद उसकी प्रवृति बदल जाती है और वह आदमखोर हो जाता है।
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मैलानी के छेदीपुर में दो साल पहले छह लोगों को निवाला बनाने वाले बाघ को जब ट्रैंक्युलाइज करके पकड़ा गया तो पता चला कि उसका एक दांत टूटा हुआ है। करीब दस साल पहले संपूर्णानगर के कांपटांडा में मारा गया आदमखोर बाघ और उसके बाद विसेनपुरी में मारी गई बाघिन काफी उम्रदराज थी। जिसके लिए दौड़ कर शिकार पकड़ना मुश्किल था। यह बाघ अपनी सुरक्षा के मद्देनजर जंगल के बाहरी किनारे फिर खेतों में आकर इंसानों और पालतू जानवरों का शिकार कर रहे थे।
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...तो जंगल में बाघों के लिए भोजन हो रहा कम
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. वीपी सिंह कहते हैं कि बाघों के जंगल से बाहर निकलकर इंसानों और पालतू जानवरों पर हमलावर होने के पीछे जंगल में बाघों के लिए घट रहा भोजन है। घटते घास के मैदानों के चलते शाकाहारी जीवों की कमी हो रही है। जंगल में पर्याप्त घास न होने के कारण शाकाहारी जीव जंगल के बाहर खड़ी फसलों पर निर्भर हो रहे हैं। जब बाघ का भोजन खेतों में है ऐसी दशा में बाघ भी अपने शिकार के पीछे खेतों में आ रहे हैं।
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जंगल का प्रबंधन सुधारने की है जरूरत
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रमेश कुमार पांडेय का कहना है कि बाघ जंगल से बाहर न निकलें इसके लिए जरूरी है कि जंगल में उन्हें पर्याप्त भोजन, पानी और अनुकूल प्राकृतिक आवास मिले। इसके लिए जंगल के ग्रास लैंड और वेटलैंड विकसित करना जरूरी है। इस पर वन विभाग काफी काम कर रहा है लेकिन और बहुत काम करना बाकी है। ग्रासलैंड और वेटलैंड मैनेजमेंट में जंगल में शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ेगी। इससे खाद्य श्रंखला मजबूत होगी। जंगल में ही पर्याप्त भोजन पानी मिलने से बाघों को जंगल से बाहर निकलने की जरूरत नहीं होगी। उनका मानना है कि बाघों को एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाने के लिए एक कॉरीडोर बनना चाहिए ताकि बाघ खेतों का सहारा लिए बिना एक जंगल से दूसरे जंगल जा सकें।
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