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बाघों के घर में अब नहीं रहेंगी इंसानों की बस्तियां

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वन्यजीवों के बीच अब नहीं रहेंगी इंसानों की बस्तियां
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दुधवा टाइगर रिजर्व में ऐच्छिक विस्थापन योजना पर काम शुरू
दुधवा टाइगर रिजर्व कोर जोन में बसे गांव जंगल से बाहर होंगे
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के प्राकृतिक आवास में इंसानों की बस्तियों को लेकर एनटीसीए गंभीर हुआ है। अब दुधवा टाइगर रिजर्व कोर जोन में बसे 15 गांवों के स्वैच्छिक विस्थापन के प्रयास शुरू हो गए हैं। मकसद है कि बाघों के प्राकृतिक आवास में इंसानी दखलंदाजी को रोकना है। इसके अलावा जंगल में बसे गांव के लोगों को और बेहतर जिंदगी उपलब्ध कराना भी है। कर्तनिया घाट वन्यजीव विहार के कोर जोन में बसे गांव भरथापुर में यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है। इसके बाद अन्य गांवों के लोगों को इसके लिए मनाया जाएगा।
देश के मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड आदि राज्यों में टाइगर रिजर्व के अंदर बसे गांवों को जंगल से हटाकर दूसरे स्थानों पर बसाया गया है और वे जंगल से बेहतर जिंदगी बसर कर रहे हैं। दुधवा टाइगर रिजर्व के अंतर्गत दुधवा नेशनल पार्क के कोर जोन में 10 राजस्व गांव चल्तुआ, कांप, किशनपुर, सूरमा, गोलबोझी, महराजनगर, जंगल नंबर एक, टांडा पश्चिम और टांडा पूरब हैं। जबकि कर्तनिया घाट वन्यजीव विहार में पांच गांव भरथापुर, भवानीगंज, बिछिया, ढखिया और टेड़ी बसे हुए हैं।
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इन गांवों को दुधवा टाइगर रिजर्व से बाहर बसाने के लिए प्रति परिवार 10 लाख रुपया सरकार देगी। परिवार में माता-पिता के अलावा 18 साल की उम्र पूरी कर चुके हर बेटे और अविवाहित बेटी को अलग-अलग परिवार मानकर दस-दस लाख रुपये दिए जाएंगे, ताकि उससे वे नई जगह पर अपना घर आबाद कर सकें। इसमें 75 फीसदी धनराशि केंद्र सरकार और 25 फीसदी धनराशि राज्य सरकार उपलब्ध कराएगी।
कर्तनियाघाट वन्यजीव विहार के कोर जोन में बसे भरथापुर गांव के लोग जंगल से विस्थापित होकर दूसरी जगह पुनर्वासित होने के लिए राजी हो गए हैं। इसका प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है। इसके अलावा दुधवा नेशनल पार्क के चल्तुआ गांव के लोगों को दूसरी जगह बसने के लिए करीब-करीब मना लिया गया है। सूरमा गांव में भी ऐसे प्रयास हो चुके हैं लेकिन राजनीतिक दखलंदाजी के चलते यह मामला अधर में लटक गया था। अब दुधवा टाइगर रिजर्व के अन्य गांवों में भी नए सिरे से प्रयास शुरू होंगे।
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दुधवा टाइगर रिजर्व को होंगे ये फायदे
आम तौर पर देखने में आया है कि शिकारी और वन अपराधी इन गांवों को अपना केंद्र बनाते हैं। जंगल के भूगोल के बारे में इन गांवों के लोग पूरी तरह जानकार होते हैं। इसका फायदा उठाकर शिकारी इनका इस्तेमाल करते हैं। इन गांवों के विस्थापन से शिकार और अन्य वन अपराधों में कमी आएगी। जंगल पर इंसानों की निर्भरता कम होगी। साथ ही बाघों की सल्तनत को पूरा विस्तार मिलेगा। बाघों के प्राकृतिक आवास में दखलंदाजी कम होगी। इससे बाघों के संरक्षण में मदद मिलेगी। तेंदुआ, हिरन और भालू समेत अन्य वन्यजीव भी सुरक्षित रहेंगे।
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जंगल से बाहर बसने पर ग्रामीणों को भी फायदे
जंगल से बाहर पुनर्वासित होने पर गांव के लोग समाज की मुख्यधारा से जुड़ेंगे। स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, संचार, बिजली, परिवहन आदि की बेहतर सुविधाएं मिल सकेंगी। इस तरह वह जंगल की अपेक्षा बाहरी इलाके में रहकर और अधिक बेहतर जीवन गुजार सकेंगे। शासन से चलने वाली जन कल्याणकारी और विकास योजनाओं का लाभ भी उन्हें मिल सकेगा। जंगली जानवरों से होने वाले जान माल के नुकसान से भी वे बच सकेंगे।
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दुधवा टाइगर रिजर्व के कोर जोन में बसे गांवों को जंगल से बाहर पुनर्वासित किए जाने की योजना है। यह योजना पूरी तरह ऐच्छिक योजना है जो बाघ और इंसान दोनों की बेहतरी के लिए है। जंगल में बसे ग्रामीणों को प्रति वयस्क व्यक्ति को परिवार मानकर दस लाख की मदद भी सरकार करेगी, ताकि वे बेहतर जीवन गुजार सकें। इसके लिए प्रयास शुरू किए गए हैं।
- रमेश कुमार पांडेय, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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