दस साल से खुद और फिर अपनी पत्नी को जितवाकर पांच सालों तक नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी पर लगातार कब्जा जमाए महमूद हुसैन खां के किले की दीवारें वर्ष 2012 में केबी गुप्ता ने दरकाकर पालिकाध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमा लिया था। इसके बाद महमूद ने अपने किले की दीवारों की मरम्मत शुरू कर दी और पांच साल बाद ही पालिकाध्यक्ष पद पर वापसी कर दी। उनकी इस जीत को उनके सरल स्वभाव और व्यक्तित्व की वजह से माना जा रहा है। फिलहाल, महमूद खेमे में जश्न है।
महमूद हुसैन खां ने करीब 15 साल पहले वर्ष 1997 में पलिया नगर पालिका अध्यक्ष की कुर्सी कांग्रेसी नेता रमेश चंद्र गर्ग से हथिया थी। इसके बाद करीब वर्ष 2002 में उन्होंने यह कब्जा कायम रखा। फिर पांच सालों बाद वर्ष 2007 के निकाय चुनाव में नगर पालिका परिषद अध्यक्ष पद की सीट सामान्य महिला के लिए आरक्षित हो गई। इससे श्री खां ने अपनी पत्नी रेहाना महमूद को मैदान में उतारा, जो इस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मीदेवी गुप्ता पत्नी केबी गुप्ता को करीब 1200 मतों से हराकर विजयी हुईं थीं। खुले तौर पर भले ही अध्यक्ष महमूद को न माना जा रहा, लेकिन पत्नी के जरिए कुर्सी पर कब्जा उन्हीं का था। इसे अप्रत्यक्ष रूप से हैट्रिक भी कहा जा सकता था। वर्ष 2012 में भी चौथी बार वह इस सीट को अपने कब्जे में कायम रखना चाहते थे, लेकिन इस बार उनके किले की दीवार दरक गई। खुद महमूद अपने किले को महफूज रखने के लिए मैदान में उतरे थे, लेकिन हालात जुदा थे और बदलाव की बयार चल रही थी। इसके बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हालात को अपने पक्ष में करने के लिए गोटें बिछाते रहे, उन्होंने बाहर से घेराबंदी खूब की और इसमें कामयाब भी रहे, लेकिन एक उम्मीदवार आरिफ खां जो कभी उनके सिपाहसालारों में गिने जाते थे वह भी वर्ष 2012 में सपा समर्थित उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे थे। यही महमूद हुसैन की परेशानी का सबब बना था। माना जाए तो हुआ भी वही, आरिफ ने 1995 वोट हासिल किए और महमूद को 1535 वोटों से हार मिली गई और केबी गुप्ता ने पालिकाध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा जमाया लिया था। लेकिन महमूद ने हिम्मत नहीं हारी और अपने सरल स्वभाव और व्यक्तित्व के जरिए अपने किले की दरकी दीवारों की मरम्मत करते रहे और नतीजा यह हुआ कि पांच साल समाजवादी पार्टी के बैनर तले उन्होंने पालिकाध्यक्ष की कुर्सी अपने नाम कर ली।