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एक साल में कम हो गए 19 हजार गोवंशीय पशु

Tue, 19 Jan 2016 06:44 PM IST
लखीमपुर खीरी।
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मशीनों पर बढ़ती कृषि की निर्भरता तथा अधिक कमाई की सोच और जिले में बढ़ती पशु तस्करी देशी गोवंशीय पशुओं पर भारी पड़ रही है। जिले में देशी गोवंशीय पशुओं की संख्या में तेजी से कमी आ रही है। हालत यह है कि पिछले पांच वर्षों में छियानबे हजार से अधिक गोवंशीय पशु कम हुए हैं। पशु पालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में प्रति वर्ष 19 हजार देशी गोवंशीय पशु कम हो रहे हैं।
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बताते चलें, किसान अधिक लाभ लेने के उद्देश्य से कृषि में मशीनों का अधिक उपयोग कर रहे हैं इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों में देशी गोवंशीय पशुओं की उपलब्धता कम होती जा रही है। किसान ढुलाई और खेतों में अधिकतर ट्रैक्टर ट्रॉली का प्रयोग करने लगे हैं। इसके अलावा दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में लगे कृषक भी देशी गोवंशीय पशुओं को पालने से बचने लगे हैं। लाभ कम होने के कारण दुग्ध उत्पादन में लगे लोग भी देशी गायों के बजाय क्रासब्रेड पशुओं को अधिक महत्व देते हैं। पशु पालन विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति अपने आप स्पष्ट हो जाती है। पशुपालन विभाग की वर्ष 2007 में हुई पशु गणना में जिले में कुल देशी गोवंशीय पशुओं की संख्या 5,08,450 थी जो वर्ष 2012 की जनगणना में 4,11,942 रह गई है। पांच वर्षों में 96,498 देशी गोवंशीय पशुओं की कमी आई है। यानी जिले में 19,299 गोवंशीय पशु प्रत्येक वर्ष कम हो रहे हैं। यदि इसी तरह से गिरावट जारी रही तो जल्दी ही गोवंशीय पशु खत्म हो जाएंगे।

क्या है मुख्य कारण
मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा.एसपी सिंह ने बताया कि जिले में ग्रामीण क्षेत्रों में हालांकि देशी गायें ही अधिक हैं, लेकिन दुग्ध उत्पादन की दृष्टि से कृषक देशी गोवंशीय पशुओं की अपेक्षा क्रासब्रेड पशु और महिषवंशीय पशुओं को अधिक पसंद करते हैं। एक कारण यह भी है कि देशी गोवंशीय पशुओं को लेकर लोग ज्यादा गंभीर नहीं रहते इसलिए यदि पशु बीमार हो गए तो अधिकतर पशुओं का लोग इलाज ही नहीं कराते हैं। इन कारणों से देशी पशुओं की संख्या कम हो रही है।
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यह भी हैं कारण
जिले में गोवंशीय पशुओं की तस्करी और हत्या भी बड़े पैमाने पर होती है। खास बात यह है कि समाजसेवी और हिंदूवादी संगठनों के तमाम प्रयासों के बावजूद भी प्रशासन इनकी हत्या रोकने को लेकर गंभीर नहीं है। प्रत्येक वर्ष सैकड़ों की संख्या में गोवंशीय पशु तस्करी कर बाहर ले जाए जाते हैं। इसकी वजह से भी गोवंशीय पशुओं की संख्या में कमी आ रही है।   

नहीं है गोशालाओं की बेहतर व्यवस्था
जिले में गोशालाओं की स्थिति भी बेहतर नहीं है, क्योंकि अधिकतर गोशालाएं या तो समाज सेवी संगठन चलाते हैं या फिर कुछ गोवंश से प्रेम करने वाले लोग अपने संसाधनों पर गोशाला संचालित करते हैं। इनके पास इतने बेहतर संसाधन नहीं होते हैं कि वे इन पशुओं को बेहतर भोजन और चिकित्सा उपलब्ध करा सकें। सरकार की अनदेखी भी इस पर भारी पड़ रही है।

लोगों को होना चाहिए जागरूक
विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय आचार्य संजय मिश्र ने कहा कि हमारे समाज को इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा गोवंशीय पशु भारत की संपन्नता में अहम भूमिका निभा सकते हैं लोग इनके महत्व को नहीं समझ पा रहे हैं गोवंशीय पशुओं की रक्षा करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। वे इसके लिए जागरूकता अभियान चलाते हैं प्रयास करते हैं कि लोग गोवंशीय पशुओं के महत्व को लेकर जागरूक हों।
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