उत्तर प्रदेश शासन के वन एवं वन्यजीव अनुभाग द्वारा 31 अक्टूबर 2017 को जारी पुनरीक्षित अधिसूचना पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने स्थगनादेश जारी कर दिया है। इस स्थगनादेश के बाद वन विभाग ने भी सभी वनाधिकारियों को संबंधित आदेश के क्रम में आवश्यक कार्रवाई के लिए पत्र जारी कर दिया है।
उत्तर प्रदेश शासन ने 31 अक्टूबर 2017 को एक आदेश जारी कर आम, नीम, साल, सागौन, महुआ और खैर को छोड़कर अन्य प्रजातियों के पेड़ों के कटान से प्रतिबंध हटा लिया था। इस आदेश के बाद शीशम आदि पेड़ों का कटान तेजी से शुरू हो गया था। इससे पर्यावरण को हो रहे भारी नुकसान को देखते हुए क्षितिज अग्निहोत्री आदि ने इस आदेश के खिलाफ पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को पार्टी बनाते हुए याचिका दायर कर आदेश पर रोक लगाने की मांग की थी।
याचिका पर सुनवाई करते हुए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने 15 दिसंबर को 31 दिसंबर 2017 के आदेश पर स्थगनादेश जारी कर दिया था। अगली सुनवाई की तिथि 30 जनवरी 2018 निर्धारित करते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश जारी किया था।
इस आदेश के बाद प्रधान मुख्य वन संरक्षक और विभागाध्यक्ष कार्यालय के मुख्य वन संरक्षक, नीति विश्लेषक एवं समन्वय वाईएसके शेषु कुमार ने प्रदेश के सभी मुख्य वन संरक्षकों, वन संरक्षकों और प्रभागीय वनाधिकारियों को पत्र लिखकर एनजीटी के आदेश के अनुरूप कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने पत्र के साथ एनजीटी का अंतरिम आदेश भी संलग्न किया है।
इस स्थगनादेश के बाद लकड़ी का व्यवसाय करने वाले लोगों में हड़कंप मच गया है। बहुत से लकड़ी व्यापारियों ने छूट प्रजाति के हरे पेड़ खरीद रखे हैं अब उन्हें कटवाने के लिए पहले की तरह परमिट लेने की कार्रवाई करनी होगी। फिलहाल, पर्यावरण प्रेमियों में एनजीटी के स्थगनादेश से खुशी है।