लखीमपुर खीरी। खेतों में इस्तेमाल हो रहे कीटनाशक से परिंदों की दुनिया उजड़ रही है। खेतों में इस्तेमाल होने वाली यह जहरीली दवाएं पानी में घुलकर जलाशयों तक पहुंच रही है। इससे नदियों, झीलों और तालाबों का पानी जहरीला हो रहा है। इसके चलते इनमें जलीय जीवों और कीटों की संख्या में कमी आती जा रही है। पानी में परिंदों के लिए भोजन नहीं बचा तो हर साल ठंडे देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में भी कमी हो रही है।
तराई क्षेत्र के जलाशयों में बड़ी संख्या में स्थानीय परिंदों का तो बसेरा है ही सर्दियों के मौसम में विभिन्न ठंडे देशों से हजारों किलोमीटर की लंबी उड़ान भरकर परिंदे तराई के जलाशयों में आते हैं। ठंडे देशों से आने वाले यह प्रवासी परिंदे यहां चार माह तक प्रवास करने के बाद मार्च माह के शुरू में अपने देश वापस लौट जाते हैं। कुछ वर्षों से देखने में आ रहा है कि साल दर साल यहां आने वाले प्रवासी परिंदों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। जिससे पक्षी विशेषज्ञ चिंतित हैं।
अतिक्रमण के चलते एक तरफ जलाशय सिकुड़ते जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उनमें सिंघाड़े की खेती होने से जलाशयों के स्वरूप में बदलाव आ रहा है। सिंघाड़े की खेती में कीटनाशकों का इस्तेमाल होने से झीलों और तालाबों में का पानी दूषित हो रहा है।
अतिक्रमण के कारण सिकुड़ गए जलाशय
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि बीस साल के अंदर तराई के वेटलैंड एरिया में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आई है। बढ़ती आबादी के दबाव के चलते तालाबों और झीलों पर अतिक्रमण कर खेती की जाने लगी है। खेती में कीटनाशकों का प्रयोग पक्षियों की मौत का कारण बन रहा है। यही कारण है कि पक्षियों की आमद कम होती जा रही है।
परिंदों के आवास को प्रभावित करने वाले कारक
1. फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग
2. वेटलैंड पर बढ़ता अतिक्रमण और इंसानी गतिविधियां
3. तालाबों में मछली पालन और सिंघाड़े की खेती
4. प्राकृतिक तालाबों का बदलता स्वरूप
5. मोबाइल टावर से बढ़ता रेडिएशन
इन प्रवासी परिंदों का आना हुआ कम
सर्दियों के मौसम में यूरोपीय और मध्य एशियायी देशों से बड़ी संख्या में ब्राह्मनी डक, रेड क्रस्टेड पोचर्ड, कांब डक, ग्रीव और पिलिकन आदि प्रवासी परिंदे तराई के जलाशयों में आते थे। बीस साल से इनकी आमद नाममात्र की रह गई है। साइबेरियन क्रेन तो यहां बीस वर्षों से दिखाई नहीं दी है।
प्रवासी परिंदों की सुरक्षा के लिए वन विभाग विशेष प्रबंध करता है। सर्दी के मौसम में जलाशयों की नियमित निगरानी कराई जाती है। यह सच है कि आबादी के दबाव और वेटलैंड के पास बढ़ती इंसानी गतिविधियों से पक्षियों का प्राकृतिक आवास कम हुआ है।
डॉ. अनिल कुमार पटेल
उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन