फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पितरों के नाम गैरों को खीर पूरी, बुजुर्ग माता-पिता से दूरी

विज्ञापन
पितरों के नाम गैरों को खीर पूरी, बुजुर्ग माता-पिता से दूरी - फोटो : पितरों के नाम गैरों को खीर पूरी, बुजुर्ग माता-पिता से दूरी
विज्ञापन
लखीमपुर खीरी।
विज्ञापन

भौतिकवादी युग में पैसा कमाने की जद्दोजहद, संयुक्त परिवारों का टूटना, लोगों का अपने आप में सिमटना यह सब बुजुर्गों पर भारी पड़ रहा है। जिन माता-पिता ने जन्म दिया, पाल-पोस कर बड़ा किया, हर तरह से लायक बनाकर सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाई। उन्हीं माता-पिता की उपेक्षा हो रही है। घर के बुजुर्ग एकाकीपन के शिकार हो रहे हैं, जिस समय उन्हें देखरेख की सबसे ज्यादा जरूरत है उस समय वह बिल्कुल अलग-थलग पड़ गए हैं। कोई अपने बेटे से पीड़ित है तो कोई अपनी बहू से। उन्हें अपनों से ही प्रताड़ित होना पड़ रहा है। ऐसे बुजुर्ग शांति और सुकून के लिए वृद्धाश्रमों की शरण ले रहे हैं। इन दिनों पितरों के श्राद्ध का पर्व चल रहा है। दिवंगत पुरखों के नाम पर गैैरों को खीर पूरी खिलाई जा रही है, लेकिन जीवित माता-पिता से दूरी संतानों के लिए शर्मनाक है। उपेक्षित बुजुर्गों का दर्द साझा करते हुए अशोक निगम और मोहम्मद रईस की रिपोर्ट।

वृद्धाश्रमों में बढ़ रहे उपेक्षित बुजुर्ग
जिले में शहर से सटे सलेमपुर कोन में हाल ही में समाज कल्याण विभाग की ओर वृद्धाश्रम खोला गया है। इसका संचालन यूपी भारतीय ग्रामीण विकास कर रही है। यह आश्रम अप्रैल 2017 में ही खुला है। आश्रम की संचालिका राधा गुप्ता बताती हैं कि इसमें 12 पुरुष और 14 महिला बुजुर्गों ने शरण ले रखी है। वृद्धाश्रम में रहने के लिए अच्छी जगह, पौष्टिक खाना, नाश्ता, ठंडा पानी मनोरंजन के लिए टीवी, पूजा के लिए मंदिर सब कुछ है। साथ रह रहे लोगों से अपनापन भी मिल रहा है। यहां रह रहे बुजुर्गों में आत्मिक संतुष्टि दिखाई देती है।
विज्ञापन


बेटा-बहू मारपीट करने से भी गुरेज नहीं करते थे
जिले के कोरैया संजर निवासी 70 वर्षीया विधवा सरोजनी देवी के दो बेटे और दो बेटियां हैं। बुढ़ापे की हालत में बेटों और बहुओं ने सरोजनी को उनके हाल पर छोड़ दिया। कभी कुछ मांग भी करतीं तो बेटे-बहू उनके साथ मारपीट करने से भी नहीं चूकते। तंग आकर वह अपनी एक बेटी के यहां रहने लगी, लेकिन बेटी ने भी ज्यादा दिनों तक उन्हें अपने पास नहीं रखा। उन्हें लाकर इस वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। उनका कहना है कि उन्हें अपने पोते पोतियों की बहुत याद आती है।

बेटा-बहू ने रामकली को खाना तक देना बंद कर दिया
सिरैंचा गांव निवासी 70 वर्षीया रामकली भी इसी वृद्धाश्रम में कुछ दिनों से रह रही हैं। मोतियाबिंद के कारण आंखों की रोशनी मंद पड़ गई है। कानों से ऊंचा सुनती हैं। इनके एक बेटा, एक बेटी है, लेकिन किसी ने भी बुढ़ापे में सहारा नहीं दिया। यहां तक कि उनका खाना-पीना भी बंद कर दिया। गांव के लोग कुछ दे जाते तो खा लेतीं और बाहर पड़ी रहती थीं। बाद में गांव वाले उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ गए। गांव के लोग तो कभी कभार उनसे मिलने आ जाते हैं, लेकिन बेटे-बहू और बेटी आज तक उनसे मिलने नहीं आए।

बुढ़ापे में शरीर कमजोर हुआ तो बेटे ने साथ छोड़ा
कैरातीपुरवा गांव की 65 वर्षीया सावित्री शरीर से काफी कमजोर हैं। बुढ़ापे के कारण जब काम करने में लाचार हुईं तो इकलौते बेटे ने उन्हें अलग कर दिया। वह मजदूरी करके गुजारा करने पर मजबूर हुईं। मजदूरी से कुछ पा जातीं तो उससे एक दो दिन का खाना हो जाता। गांव वाले भी दया कर उन्हें कुछ न कुछ खाने को दे देते थे। जब गांव वालों को वृद्धाश्रम का पता चला तो वे सावित्री देवी को यहां छोड़ गए।

अपनों ने किया बेसहारा तो वृद्धाश्रम में लिया आसरा
वृद्धाश्रम में रह रहे पुरुष बुजुर्गों का भी कुछ यही हाल है। रौसा निवासी असगर की शादी नहीं हुई। थोड़ी जमीन थी वह भाई ने अपने नाम लिखा ली और उसे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया। कृष्णा नगर निवासी शिवमंगल भी अपने परिवार से उपेक्षित होकर यहां रह रहे हैं। मरखापुर के राजाराम नि:संतान हैं। 40 साल पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। अब वह अपने भाइयों को बोझ लगने लगे तो उन्हें वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ी।
विज्ञापन


जब असहनीय होती है उपेक्षा तो जाते हैं वृद्धाश्रम
भौतिकवादी इस युग में छोटे परिवार का जो कल्चर विकसित हो रहा है। उसमें संतान बुजुर्ग माता-पिता को भी अपने परिवार में शामिल नहीं रखना चाहता, कभी आर्थिक कारण तो कभी प्राइवेसी के बहाने युवा अपने बुजुर्ग माता-पिता से दूरी बना रहे हैं। प्राचीन भारतीय संस्कृति से युवाओं की दूरी भी परिवारों को तोड़ रही है। एक कारण यह भी है कि उम्र के साथ बुजुर्गों में समायोजन क्षमता कम हो जाती युवाओं में यह क्षमता पहले से ही कम है। अपनों की उपेक्षा से बुजुर्ग अवसादग्रस्त हो रहे हैं। इसके चलते बुजुर्गो को अपनों के होते हुए भी वृद्धाश्रमों की शरण लेनी पड़ रही है।
- डॉ. अन्नपूर्णा गुप्ता, विभागाध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग,
भगवानदीन आर्यकन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें