लखीमपुर खीरी। गांव की महिलाएं अब चूल्हा-चौका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अब वे अलग-अलग रोजगार से जुड़कर कर खुद की किस्मत बदल रही हैं। जनपद की 276 महिलाएं बैंक सखी और 1041 बीसी सखी बनकर गांव में ही रोजगार पाया है। यह महिलाएं आत्मनिर्भर बनने के साथ ही अपने परिवार का सहारा भी बन गई हैं।
लंबे समय तक ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के लिए रोजगार के मौके सीमित रहे हैं, लेकिन सरकार की महत्वाकांक्षी बैंक सखी योजना ने उनके जीवन में नई रोशनी भर दी है। जनपद की 1165 ग्राम पंचायतों में 25 हजार से अधिक स्वयं सहायता समूहों से लाखों महिलाएं जुड़ी है। इसमें महिलाएं डिजिटल और वित्तीय सेवाओं की पहुंच ग्रामीणों तक सहजता से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
सरकार से प्रत्येक बैंक सखी को 4,000 रुपये महीना मानदेय दिया जाता है, जबकि बीसी सखी को छह माह तक चार हजार रुपये मानदेय और उसके बाद कमीशन पर काम करती हैं। बैंक सखी की महिलाओं का काम तीन दिन बैंक व तीन दिन गांवों में रहकर काम करना होता है।
समूहों का खाता खोलने, उनके साथ बैठक करने आदि काम वे करती हैं। बीसी सखी घर-घर जाकर बैंकिंग लेनदेन, खाता खोलने, सरकारी योजनाओं की जानकारी देने आदि काम करती हैं।
बैंकिंग सेवाएं प्रदान करने का अवसर मिला है। बैंक सखी के रूप में वित्तीय साक्षरता और बैंकिंग की सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं, जिससे उन्हें अपनी अलग पहचान और सम्मान मिला है।
-आकांक्षा, बैंक सखी, नयागांव लखीमपुर
गांव-गांव जाकर महिलाओं को बैंकिग से जुड़ी जानकारी देती हूं। उनकी हर संभव मदद करती हैं। इससे आय का साधन बढ़ने से आर्थिक मजबूती मिल रही है।
-ऊषा देवी, बीसी सखी बड़ागांव पलिया।
सरकार की महत्वाकांक्षी बैंक सखी योजना से उनको गांव में ही रोजगार मिला है। इससे आर्थिक मजबूती मिली है। अब वे अपने खर्चे खुद ही उठाती हैं।
-शिफा, बैंक सखी बसंतापुर कलां पलिया
आकांक्षा
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