जहां से गुजरे भगवान बुद्ध, संवारे जाएंगे स्थल
वैशाली से आते वक्त बुद्ध ने ककुत्था नदी का अंतिम बार ग्रहण किया था जल
भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों को चिह्नित कर बनाई जा चुकी है कार्ययोजना
कुशीनगर के अलावा और भी हैं बुद्ध से जुड़े स्थल, जहां किए थे विश्राम
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर/जौरा बाजार। वैशाली से आते समय भगवान बुद्ध कुशीनगर जिले में जिन स्थलों पर विश्राम किए थे, सदियों बाद उन स्थलों के दिन बहुरने वाले हैं। उनमें से फाजिलनगर क्षेत्र की घाघी नदी के पुरैना घाट से लेकर रहसू जनूबीपट्टी, फरेंदहा, बदुरांव सहित अनेक गांवों में वह स्थल हैं, जहां उस जमाने में बोधिवृक्ष, टीले, कुएं और स्तूप थे। इसके लिए विषय वस्तु विशेषज्ञों के साथ अफसरों और जनप्रतिनिधियों की बैठक के बाद कार्ययोजना तैयार की है।
भगवान बुद्ध से जुड़े प्रमुख स्थलों में ककुत्था नदी भी है, जिसके तट पर न केवल उन्होंने स्नान किया था, बल्कि अंतिम बार जल भी ग्रहण किए। उसके बाद गरिष्ठ भोजन कर लेने की वजह से अतिसार (डायरिया) से ग्रस्त हो गए। वहां से कुशीनगर आते समय उन्होंने कई स्थानों पर विश्राम किए थे। उन स्थलों का जिक्र बौद्घ ग्रंथ दिग्ध निकमा में भी वर्णित बताया जाता है। अलग-अलग नाम से वह जगह आज भी वजूद में हैं, लेकिन पर्यटकों की कौन कहे, क्षेत्र के बहुत से लोग भी उस बारे में नहीं जानते। भगवान बुद्ध की उस पहचान को पुन: जीवंत करते हुए पर्यटन स्थली के रूप में विकसित करने की तैयारी कर ली गई है।
इतिहास में ककुत्था नदी का महत्व
इतिहासकार डॉ. श्यामसुंदर सिंह बताते हैं कि आज की घाघी नदी का पुरैना घाट भगवान बुद्ध के जीवनकाल के समय ककुत्था नदी के नाम से जाना जाता था। इस प्राचीन नदी का जिक्र बौद्घ साहित्यों में भी मिलता है। उसमें बताया गया है कि भगवान बुद्ध वैशाली से कुशीनगर पैदल आते समय भंडग्राम, हस्ती ग्राम, जंबू ग्राम, आम्रग्राम (वर्तमान में यह सभी गांव बिहार के गोपालगंज जिले में), भोगनगर (वर्तमान नाम बदुरांव), पावा (वीरभारी उर्फ उस्मानपुर), घोड़धाप (नलिका) होते हुए ककुत्था नदी के किनारे पहुंचे थे। कहा जाता है कि तथागत को उनके शिष्य चुंद ने गरिष्ठ भोजन दे दिया था। इस कारण वह अतिसार के शिकार गए थे। फिर भी उनकी अंतिम यात्रा पावा (वीरभारी) से लेकर ककुत्था नदी के तट तक वह उनके साथ रहा। भगवान बुद्ध उसके कृत्य के बारे में जानने के बावजूद ककुत्था नदी के पूर्वी तट पर स्थित रसाल वन में उपदेश देते हुए उसे निष्कलंकता का वरदान देकर वापस भेज दिए थे। इसके बाद पैदल कई गांवों से होते हुए कुशीनगर आए थे, जहां उन्होंने हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था।
बुद्ध स्थली विकसित होने की जगी उम्मीद
पर्यटन विभाग की मानी जाए तो गौतम बुद्ध के चरणरज में सनी इस क्षेत्र की धरा और उनसे जुड़े स्थलों के भी दिन संवरने की प्रबल उम्मीद जग गई है। क्योंकि बीते जुलाई में ही इसे लेकर संस्कृति, पुरातत्व, राजस्व सहित अनेक विभागों के अफसरों की बैठक जनपद मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट सभागार में डीएम और सीडीओ की उपस्थिति में हुुई थी। इस बैठक में सांसद विजय कुमार दुबे, कुशीनगर विधायक रजनीकांत मणि त्रिपाठी एवं फाजिलनगर के विधायक गंगा सिंह कुशवाहा भी शामिल हुए थे। वैशाली से आते समय भगवान बुद्ध जिन मार्गों से आए, जहां-जहां विश्राम किए, उन स्थलों के विकास की कार्ययोजना बनाकर पर्यटन विभाग को सौंपने का बैठक में निर्देश दिया गया। कार्ययोजना तैयार करने की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग को दी गई थी। उस विभाग ने सितंबर में कार्ययोजना बनाकर पर्यटन विभाग को सौंप दी है।
बौद्घ ग्रंथ के अनुसार भगवान बुद्ध से जुड़े बोधिवृक्ष, टीले, कुएं, स्तूप सहित अन्य निशानियों को विकसित किए जाने के लिए ही पिछले जुलाई महीने में संस्कृति, पुरातत्व सहित अन्य विभागों के विषय वस्तु विशेषज्ञों तथा अफसरों के साथ बैठक हो चुकी है। कार्ययोजना बन चुकी है। अब उसे उच्चाधिकारियों को भेजा जाना है।
- राजेश भारती, पर्यटन सूचना अधिकारी