जनपद के निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों को घर से स्कूल और स्कूल से घर तक पहुंचाने वाले अधिकतर वाहन मानकों की कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे हैं। दस वर्ष से भी पुराने वाहन, मेडिसीन किट का अभाव, वाहनों का इंश्योरेंस, चालकों को पूरी तरह प्रशिक्षित न होना सहित कई कारक हैं, जिनका खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। कई वाहन ऐसे हैं, जो इसके लिए निर्धारित मानक पूूरे नहीं करते हैं। रिक्शा और टेंपोचालक से ढोए जा रहे बच्चों के मामले में तो हद ही है कि बच्चों को लटककर बैठना पड़ रहा है। बच्चों की जान खतरे में डालने वाले ऐसे लोगों के खिलाफ न तो अभिभावक मुखर दिख रहे हैं और नही प्रशासन कोई कार्रवाई करते दिख रहा। कसया में एनएच पर धुरिया मोड़ के निकट हुई दुर्घटना भी चालक की मनमानी के कारण हुई।
मौजूदा समय में निजी विद्यालयों की तरफ से संचालित होने वाले 326 वाहन ही एआरटीओ कार्यालय में पंजीकृत हैं। इनमें बस से लगायत टेंपो, मैजिक और अन्य वाहन शामिल हैं, जबकि जनपद में संचालित विद्यालयों की संख्या काफी अधिक है। पडरौना नगर में ही देख लें, कई ऐसे विद्यालय हैं जहां पढ़ने वाले बच्चे रिक्शा से आते-जाते हैं। एक-एक रिक्शा पर आठ से दस बच्चे बैठाए जाते हैं। रिक्शा पर झूल रहे बच्चों के गिरने का अंदेशा बना रहता है। इसी तरह चार सीटर वाहन के रूप में रजिस्टर्ड होने वाले टेंपो में 17-18 बच्चे बैठाए जाते हैं। टेंपो अलग अनियंत्रित होकर पलट जाए जो इनकी जान खतरे में पड़ सकती है। मैजिक जैसे वाहनों का भी यही हाल है। कसया में ट्रक से भिड़ने वाले मैजिक में 17 बच्चे बैठाए गए थे। कई विद्यालयों के संचालक तो खुद का वाहन रखने की बजाए भाड़े के वाहन संचालित करते हैं, जिसे चालक मनमानी तरीके से ड्राइव करते हैं।
एआरटीओ पीके सरोज ने बताया कि स्कूल वाहन के रूप में कुल 326 वाहन ही रजिस्टर्ड हैं। नियमविरुद्ध तरीके से संचालित होने वाले वाहनों के खिलाफ प्रवर्तन दल की तरफ से समय-समय पर कार्रवाई होती रहती है।
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स्कूल वाहनों के लिए निर्धारित नियम
स्कूल बस में फर्स्ट एड बॉक्स होना चाहिए।
बस के शीशे पर छड़ की रेलिंग लगी हों।
अटेंडेंट यानी चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस, आईकार्ड और वाहन के कागजात होने चाहिए।
विद्यालय की ओर से चालक को वाहन चलाने के लिए प्रदत्त प्रमाण पत्र होना चाहिए।
यदि स्कूल का निजी वाहन या बस हो तो वह पीले रंग में होना चाहिए।
वाहन पर विद्यालय का नाम, प्रबंधक और प्रधानाचार्य का पता एवं फोन नंबर होना चाहिए।
स्कूल वाहन का फिटनेस प्रमाण पत्र होना जरूरी है।
स्कूल वाहनों के साथ पूर्व में हुई दुर्घटनाएं-
0 12 अगस्त 2010 को हाटा के पैकौली गांव के सामने स्कूल वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। हादसे में 50 बच्चे घायल हुए थे। 15 सीट वाली इस बस में 70 बच्चों को ठूसकर बैठाया गया था।
0 11 जुलाई 2011 को नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत्र के देवगांव के निकट स्कूली बच्चों से भरे टेंपो को बस ने ठोकर मार दी थी। दो बच्चों की मौत हो गई थी, नौ गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
0 तीन फरवरी 2014 को खड्डा थाना क्षेत्र के रामपुर गोनहा गांव के निकट स्कूल बस गड्ढे में गिर गई थी। 35 सवारी की उस बस में 70 बच्चे बैठाए गए थे। बस का हेल्पर और एक बच्चे की मौत हो गई थी, जबकि कई बच्चे घायल हुए थे। उस बस का इंश्योरेंस ही नहीं था। ये घटनाएं बताती हैं कि स्कूल बसों के संचालन में किस कदर मनमानी की जाती है।