पडरौना। छठ पर्व की लोक आस्था और ऐतिहासिकता के साथ विज्ञान को भी समेटे है। इसके चलते इस पर्व का महत्व सबसे अधिक है। मान्यता है कि छठ, षष्ठी का अपभ्रंश है।
कार्तिक मास की अमावस्या को दिवाली मनाने के बाद इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा।
विजयपुर दक्षिण पट्टी के ज्योतिषाचार्य पंडित राजकिशोर मिश्र ने बताया कि ऐसा माना जाता है कि माता सीता ने पहली बार मुंगेर में छठ पर्व मनाया था। इसके बाद ही छठ महापर्व की शुरुआत हुई। इसीलिए मुंगेर और बेगूसराय में छठ महापर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस पर्व की ऐतिहासिकता के साथ वैज्ञानिक महत्व भी कम नहीं है।
उदित नारायण इंटर कॉलेज के उप प्रधानाचार्य अजय कुमार सिंह ने बताया कि छठ जैसी खगोलीय स्थिति (चंद्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की समरेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ अपवर्तित होती हुई पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं।
वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुई सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार भी यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छह दिन उपरांत आती हैं। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम छठ पर्व ही रखा गया है।