तमकुहीरोड। पूर्वांचल के किसानों और गन्ने की खेती के लिए वरदान माना जाने वाला सेवरही का बाबू गेंदा सिंह गन्ना शोध एवं प्रजनन अनुसंधान केंद्र, उपेक्षा और संसाधनों के अभाव के चलते बदहाल है। वैज्ञानिकों की कमी का भी संस्थान पर काफी असर पड़ रहा है। 1995 में इस संस्थान में निदेशक का पद समाप्त किए जाने के साथ इसकी बदहाली का दौर शुरू हो गया।
क्षेत्र के गन्ना किसानों ने शासन से संस्थान की पुरानी पहचान दिलाए जाने की मांग की है। सेवरही स्थित बाबू गेंदा सिंह गन्ना शोध एवं प्रजनन अनुसंधान केंद्र की स्थापना वर्ष 1976 में हुई थी। शुरुआती दौर में यह संस्थान शाहजहांपुर से संबद्ध था और वहीं से इसका संचालन किया जाता था। वर्ष 1987-88 में प्रदेश सरकार ने पूर्वांचल में गन्ना उद्योग को बढ़ावा देने के लिए इस संस्थान में निदेशक का पद सृजित कर इसे स्वतंत्र रूप से चलने का मार्र्ग प्रशस्त कर दिया। इस संस्थान के पहले निदेशक डॉ एचएन सिंह बनाए गये।
उनकी देखरेख में संस्थान तरक्की से संतुष्ट सरकार ने संस्थान के लिए अलग से बजट की व्यवस्था करते हुए गन्ना शोध केंद्र कूड़ाघाट गोरखपुर, लक्ष्मीपुर, कटया, सादात, कुशीनगर, गाजीपुर, अमहट, सुल्तानपुर, घाघरा घाट और बहराइच को भी इससे संबद्ध कर दिया। उस समय गन्ने की उन्नतशील प्रजातियों को विकसित करने की बदौलत इस संस्थान की पहचान एशिया स्तर पर बन गई थी। लेकिन 1995 में संस्थान के निदेशक का तबादला हो गया है और दो साल तक यह पद रिक्त रहा। वर्ष 1997 में प्रदेश सरकार ने इस संस्थान से निदेशक का पद समाप्त कर इसे शाहजहांपुर से संबद्ध कर दिया।
इसके बाद इस संस्थान के प्रति शासन की उदासीनता बढ़ती गई और यह बदहाली का शिकार हो गया। उधर संस्थान के निदेशक एवं सलाहकार का पद समाप्त होने के बाद यहां वैज्ञानिकों की संख्या लगातार घटती गई जिससे नए शोध प्रभावित होने लगे। केन यूनियन सेवरही के चेयरमैन सुरेंद्र राय और उपाध्यक्ष बासुदेव रौनियार का कहना है कि पूर्वांचल के गन्ना किसानों के लिए संस्थान कभी वरदान था।
संस्थान को पुराना स्वरूप मिल जाता तो यहां गन्ने की उन्नतशील खेती फिर पटरी पर लौट आती। विधायक अजय कुमार लल्लू का कहना है कि सरकार गन्ना किसानों के प्रति संवेदनहीन हो चुकी है। संस्थान की व्यवस्था ठीक कराने के लिए शासन स्तर पर मुद्दे को रखा जाएगा।