राम-लक्ष्मण समेत चारों भाइयों के विवाह के बाद माह भर चला उत्सव
बापू ने दशरथ के चारों पुत्रों के नामकरण, विश्वामित्र यज्ञ, राम-जानकी विवाह व अयोध्या में उत्सव की कथा सुनाई
अमर उजाला ब्यूरो
कसया। कुशीनगर में चल रही रामकथा के आठवें दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने दशरथ के चारों पुत्रों के नामकरण, शिक्षा, गुरु विश्वामित्र के आश्रम में जाकर राक्षसों का वध करके यज्ञ पूर्ण कराने, अहिल्या उद्धार, राम विवाह, परशुराम-लक्ष्मण संवाद, चारों भाइयों के विवाह आदि की कथा सुनाई।
मोरारी बापू ने कहा कि महर्षि वशिष्ठ ने अपने तपोबल से चारों भाइयों को पहचानकर उनके कार्य व प्रवृति के अनुसार नामकरण किया। बाललीला के बाद चारों भाई महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने गए। राजमहल लौटे तो महर्षि विश्वामित्र पहुंचे और राम-लक्ष्मण को अपने यज्ञ की सुरक्षा के लिए मांगा। राजा दशरथ ने आनाकानी की तो महर्षि विश्वामित्र के बताया कि विश्व कल्याण के लिए यह यज्ञ आवश्यक है। वहां राक्षसों का वध केवल राम-लक्ष्मण ही कर सकते हैं।
दोनों भाई महर्षि विश्वामित्र के आश्रम पहुंचे और उत्पात मचा रहे राक्षसों को निर्वाण प्रदान किया। ताड़का व सुबाहु का वध करने के अलावा मारीच को वहां से सात योजन दूर समुद्र के किनारे फेंक दिया। यज्ञ पूर्ण होने के बाद दोनों भाई महर्षि विश्वामित्र के साथ राजा जनक के यहां मिथिला पहुंचे। वहां दोनों सुंदर राजकुमारों को देखकर राजा जनक भी भाव विभोर हो गए। राजा जनक ने विश्वामित्र से पूछा कि इतने सुंदर युवक कौन हैं जिन्हें देखकर मेरा मन भी मोहित हो गया। महर्षि विश्वामित्र ने राजकुमारों का परिचय कराया। इसके बाद सभी को महल में ठहराया गया। शाम को दोनों भाई जनकपुर नगर में घूमने निकले तो चारों ओर इनकी सुंदरता की चर्चा होने लगी। सुबह गुरु की पूजा के लिए फूल लेने पुष्प वाटिका पहुंचे तो वहां राजकुमारी सीता रामचंद्र जी को देखकर भाव विभोर हो गईं। सीता जी ने कुल देवी की पूजा की। कुल देवी ने आशीर्वाद दिया जो तुम्हारे मन में है वही तुम्हारा वरण करेगा। दूसरे दिन राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया। इससे नाराज परशुराम वहां पहुंचे और राम को पहचानकर स्तुतिगान किया। खबर पाकर राजा दशरथ बरात लेकर मिथिला पहुंचे। वहां राम का सीता से, भरत का मांडवी से, लक्ष्मण का उर्मिला से और शत्रुघ्न का श्रुतिकीर्ति से विवाह संपन्न हुआ।
अयोध्या वापस लौटने पर उत्सव का माहौल था। ऐसा लगा कि एक महीने तक सूर्य अयोध्या के आकाश में ही टिके रह गए हों। धीरे-धीरे सभी रिश्तेदार वापस चले गए। राजा दशरथ ने महर्षि विश्वामित्र को विदा करते हुए कहा कि प्रभु सब कुछ आपका ही है, लेकिन महर्षि विश्वामित्र ने कहा कि मेरा काम पूरा हुआ, अब मुझे अपने आश्रम जाना है। महर्षि ने राजा का रथ भी स्वीकार नहीं किया और पैदल ही वन की ओर चले गए।