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महावीर स्वामी की महापरिनिर्वाण स्थली पर पर्यटन की संभावनाएं

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भारीटोले में खुदाई में मिली नींव। - फोटो : amar ujala
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जोकवा बाजार (कुशीनगर)। गौतम बुद्ध की तरह ही दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की निर्वाण स्थली भी कुशीनगर जिले में ही है। उनसे ताल्लुक रखने वाले फाजिलनगर क्षेत्र में कई ऐसे टीले हैं, जिन्हें इतिहासकार भी प्रमाणित कर चुके हैं। फिर भी इन्हें पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं किया जा सका है। लोगों का मानना है कि इस क्षेत्र में भी पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, जिन्हें सहेजकर पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
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क्षेत्र का पावानगर जो अब फाजिलनगर के नाम से जाना जाता है। यहां वीरभारी का टीला है। बदुरांव में भोगनगर, फरेंदहा में चंद्रस्थल, बकुलहर में घोड़धाप और नदवा गांव में नंदग्राम का टीला है। ये टीले पुरातात्विक और एतिहासिक महत्व को सहेजे हुए हैं। क्षेत्र के इतिहासकार डॉक्टर श्यामसुंदर सिंह, जो पैरों से दिव्यांग हैं, 40 वर्षों की कठोर साधना के बाद इन टीलों से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर इनका महत्व लोगों के सामने प्रस्तुत किए थे। वह बताते हैं कि वीरभारी का टीला छठी सदी ईसा पूर्व में मल्ल राजाओं की राजधानी रही। इसका शोध पत्र 1995 में प्रोफेसर दयानंद त्रिपाठी के जरिए गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में पढ़ा जा चुका है। इनके अलावा रूस, चीन, अमेरिका जैसे देशों के विद्वान भी इससे परिचित हैं। हाल में हुई वीरभारी टीले की आंशिक खुदाई में तीन ईंटों पर मिलीं आकृतियां मल्ल राजाओं के समय की ओर संकेत देती हैं। डॉक्टर श्यामसुंदर सिंह के मुताबिक 1996 में प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दयानाथ त्रिपाठी, प्रोफेसर आरके वर्मा, प्रोफेसर वीडी मिश्र तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर कृष्णानंद त्रिपाठी की अध्यक्षता वाली टीम ने भी वीरभारी टीले की खुदाई की थी और स्पष्ट किया कि छठी सदी ईसा पूर्व में स्थापित पावानगरी मल्ल राजाओं की राजधानी रही, जिसका अवशेष वीरभारी के टीले में माना जाता है।

महावीर स्वामी और गौतम बुद्ध से इस स्थल का ताल्लुक
इतिहासकार बताते हैं कि चंपा, मगध, वैशाली, भंडग्राम, हस्तीग्राम (श्रीपुरकोठी), जंबूग्राम (जमुनहा बाजार), आम्रग्राम (अमया) गोपालगंज, भोगनगर (बदुरांव), पावा (वीरभारी), घोड़धाप (बकुलहर), नंदग्राम (नदवा), कुकुत्था (पुरैना) कुशीनगर होते हुए पश्चिम में मध्य एशिया यूरोप को चला जाता था। इसका पूरी तरह से अवशेष वीरभारी टीले से प्राप्त हुआ है। इसका अनुसरण करके आने वाले जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण पावानगर (वीरभारी) में हुआ था, जबकि कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त करने वाले भगवान बुद्ध पावानगर (वीरभारी) में बीमार होने के बावजूद सोनरा नाला (बकुलहर) और कुकुत्था (पुरैना घाट) का पानी पीने के बाद कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किए थे। फिर भी अंतरराष्ट्रीय महत्व का यह क्षेत्र पर्यटन के लिहाज से उपेक्षित है। यदि इसे पर्यटन के रूप में विकसित किया जाए तो देसी-विदेशी सैलानियों के आने से सरकार को राजस्व और बेरोजगार नौजवानों को रोजगार मिल सकेगा। 
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