कसया, कुशीनगर स्थित रामाभार स्तूप पर बौद्ध भिक्षुओं ने शनिवार को देर शाम एकत्र होकर महाअष्टमी पर प्रत्येक वर्ष की तरह इस साल भी परंपरागत तरीके से पूजन-अर्चना की।
पूजा की शुरुआत भगवान बुद्ध की वंदना से हुई। यह पूजा स्तूप परिसर में बौद्ध भिक्षुओं की ओर से काफी देर तक चलती रही। पूजा के दौरान मौजूद बौद्ध भिक्षुओं ने स्तूप की कतारबद्ध होकर परिक्रमा की। उसके बाद पूरे स्तूप के चारों तरफ उनकी ओर से दीप भी जलाया गया।
इससे स्तूप परिसर रोशनी से नहा उठा। एक बौद्ध भिक्षु ने इस पूजा की महत्ता के बारे में बताया कि वैशाली से जब भगवान बुद्ध कुशीनगर पहुंचे तो वैशाख मास के पूर्णिमा के दिन उनका महापरिनिर्वाण हुआ। इस दौरान कुशीनगर में मल्ल राजाओं का राज्य था। बौद्ध भिक्षु के अनुसार भगवान बुद्ध का अंत्येष्टि स्थल रामाभार स्तूप ही रहा होगा। भिक्षु ने बताया कि शरीर त्याग के बाद भगवान बुद्ध के शव को लोगों के दर्शन के लिए सात दिन तक यहीं पर रखा गया था और आठवें दिन उनका मल्ल राजाओं की तरफ से सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।
इसी के मद्देनजर प्रत्येक वर्ष महाअष्टमी के दिन परंपरागत तरीके से भगवान बुद्ध की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के दौरान भंते सोंगक्रान, तेनजिंग लामा, भंते महेंद्र, भंते नंदरतन, डॉक्टर बीएन सिंह, सुबोध कुमार, अंबिकेश त्रिपाठी, रमेश अग्रहरि, सुधीर राव सहित कुशीनगर स्थित अधिकांश मंदिरों और बौद्ध बिहारों के प्रमुख लोग मौजूद रहे।