पडरौना। गांधी की कर्मभूूमि रहा चंपारण चार दशक तक डकैतों, आपराधिक गिरोहों का अभ्यारण्य बना रहा। लंबे समय तक इसका सरदार वासुदेव यादव रहा जिसे दस्यु गिरोह का सरगना माना जाता था।
1989 में खड्डा थाना क्षेत्र के दियारा के मरिचहवां गांव में 13 निर्दोष ग्रामीणों को कतार में खड़ा कर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के बाद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी भी गांव में गए थे। इस घटना में दस्यु गिरोह के सरदार का ही हाथ था। तब रामायसी कुशवाहा और वासुदेव यादव के बीच वर्चस्व की लड़ाई में निर्दोष लोग भेंट चढ़ गए। लंबे समय तक अपने आतंक से बिहार को प्रभावित करने के साथ वासुदेव यादव का कुशीनगर में भी खौफ था। 2008 में वासुदेव ने आत्मसमर्पण किया तब उसपर यूपी में 50 हजार और बिहार के दो लाख का इनाम था। लकवा के कारण उसे जमानत मिलने के बाद उसकी करतूत लोग याद कर रहे हैं।
पश्चिम चंपारण का क्षेत्र उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के साथ नेपाल की सीमा से लगा है। डकैतों-तस्करों के लिए एक तरह से यह लंबे समय तक अभ्यारण्य बना रहा। पिछले दो दशक में ऐसी स्थिति आई कि चंपारण में कई दस्यु सरदार पुलिस के सामने सरेंडर कर गए या मारे गए।