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निर्वाण पथ अलंकार मुक्त होता है : बापू

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निर्वाण पथ अलंकार मुक्त होता है : बापू
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वेदों का सार तत्व उपनिषद है, ब्रह्म उपनिषद में निर्वाण की है विस्तृत व्याख्या
अमर उजाला ब्यूरो
कसया(कुशीनगर)। निर्वाण व्यक्ति के अंत:करण में बदलाव करता है। अंत:करण में बदलाव की यह प्रक्रिया अलंकार मुक्त होती है। ऐेसे में निर्वाण पथ को अलंकार मुक्त कहा जाता है। ब्रह्म उपनिषद में निर्वाण की व्याख्या है। रामकथा जीवित निर्वाण यात्रा है। जहां लोक नहीं वहां लोकोपवाद भी नहीं है।
ये बातें बृहस्पतिवार को रामकथा के दौरान मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कथा वाचक मोरारी बापू ने कहीं। छठे दिन की कथा की शुरूआत में ही कथा वाचक ने कहा कि यह जीवित निर्वाण की यात्रा है। निर्वाण व्यक्ति के अंत: करण में बदलाव करता है। निर्वाण शब्द की बृहद व्याख्या ब्रह्म उपनिषद में है। उपनिषद मूल रूप से वेदों का अंश है। कुछ लोग 108 तो कुछ लोग 252 उपनिषदों की बात करते हैं। उपनिषद में आत्मानुभूति की बात कही गई है। आत्मानुभूति की व्याख्या करते हुए कथा वाचक ने कहा कि यह भ्रमर गुंजन की तरह है जिसमें किसी प्रकार के राग, भाषा या व्याकरण की जरूरत नहीं पड़ती।
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वाणी भी भोग है पहले गुंजन करो, फिर स्वाद मिलेगा। श्रीमद्भागवत गीता को लिखा तो वेदव्यास जी ने लेकिन उसे गुनगुनाया शुक (तोता) ने। तो यह तोते का गुंजन है। यत्र लोका न लोका, यत्र देवा न देवो का अर्थ समझाते हुए कहा कि जहां न कोई लोक है न तो कोई देवता ऐसी जगह पर कोई लोकोपवाद भी नहीं। यही स्थिति वास्तव में निर्वाण की स्थिति है। जहां कोई किसी का आलोचक न हो, कोई सुख या दुख की अनुभूति न हो, कोई ईर्ष्या-द्वेष न हो। ऐसी स्थिति ही लोकापवाद से बचाती है और यही निर्वाण की राह है। रामकथा भी व्यक्ति को संशय और लोकापवाद से बचाती है। इस कथा को सुनने का जो सुख है वही जीवित निर्वाण यात्रा है। व्यक्ति अहंकार मुक्त हो जाए तो यही निर्वाण है।
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