संवाद न्यूज एजेंसी
तुर्कपट्टी। पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती। इसीलिए संसार के समस्त, दुक्ख, तिरस्कार व अपमान को सहते हुए भी अपने पाल्यों का पोषण करने के कारण माता को जगत-जननी से विभूषित किया गया है। माता को पिता से पहले व सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है।
ये बातें मानस मर्मज्ञ रघुनंदनदास जी महाराज ने कहीं। वे रविवार को क्षेत्र के रूदवलिया गांव स्थित हवई माता मंदिर परिसर में आयोजित नौ दिवसीय शतचंडी महायज्ञ में कथा सुना रहे थे। उन्होंने श्रद्धालुओं को मां के ममतामयी स्वरूप के महत्व का वर्णन करते हुए कहा कि हर युग में माता का स्थान सर्वोपरि रहा है। दुनिया में व्यक्ति की सच्ची हितैषी सिर्फ मां होती है। ऐसे में यदि आप जीवन में सुखी रहना चाहते हैं, तो मां का कभी अनादर मत करें। क्योंकि मां के चरणों में ही जन्नत है। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जिसके साथ माता जुड़ा हुआ है। यह सौभाग्य किसी भी देश को नहीं मिला है।
इस दौरान भानुप्रताप सिंह, रोहित सिंह, टुन्नू गोंड़, रणजीत सिंह, जयप्रकाश मिश्र, बिन्दू यादव, रोहित सिंह, अर्जुन चौहान, रविंद्र मद्धेशिया, कमलेश गोंड़, मंजू चौहान, नेपाल मद्धेशिया, रंजीत, अत्रिमुनि मिश्र, टुन्नू गोंड़, छोटलाल मिश्र आदि मौजूद रहे।