लोकरंग के आयोजन स्थल पर लोकतंत्र की व्यथा बयां करती कलाकृति।
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फाजिलनगर। सांस्कृतिक रंग में रंगे लोकरंग का शुक्रवार की रात भव्य आगाज हुआ। राजस्थान की कठपुतली नृत्य और घूमर नृत्य ने जहां दर्शकों का मन मोह लिया, वहीं शीलू राजपूत की आल्हा गायकी भी रोमांच से भरी हुई थी। दर्शकों ने घूमर लोकनृत्य की शानदार प्रस्तुति की सराहना की।
फाजिलनगर क्षेत्र के जोगिया गांव में इस लोकरंग कार्यक्रम का 11वां साल है। इस वर्ष का आयोजन प्रसिद्ध जनकवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ को समर्पित किया गया है। स्वाधीनता सेनानी और भोजपुरी के प्रसिद्ध कवि रमाकांत द्विवेदी ‘रमता’ ने अनेंक यादगार गीतों की रचना की। ‘हमनी देशवा के नया रचवइया हईं जा, हमनी साथी हईं, आपस में भइया हईं जा या ’राजनीति सबके बूझे के बुझावे के परी’ आदि गीत भोजपुरी गीतों के क्रांतिकारी चेतना की थाती हैं। इस कार्यक्रम में लोकरंग-2018 की पत्रिका की विशेषता बताई गई।
मौजूद लोगों को बताया गया कि इस पत्रिका में संपादकीय के अलावा सात पठनीय लेख हैं। इसमें तैयब हुसैन ने ‘सांस्कृतिक संसार में अभिजात्य बनाम लोक-भावना’, कवि बलभद्र ने ‘लोकगीत: लेखा-देखा’, सुरेश कांटक ने ‘लोक गाथाओं के अमर सर्जक’, डॉ क्षमाशंकर पांडेय ने ‘रोपनी: संज्ञा, क्रिया, गीत’, डॉ. आद्या प्रसाद द्विवेदी ने ‘पूर्वांचल का लुप्त प्राय लोकनाट्य: बटोहिया’, डॉ. राम प्रकाश कुशवाहा ने ‘भोजपुरी लोकगाथा गोपीचंद का काव्यात्मक महत्व’ और भोजपुरी कवि प्रकाश उदय ने ‘लोककथा को लेकर, कहना भी होना’ शीर्षक से लेख लिखा है। पत्रिका के संपादक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने ‘जंतसर’ पर केंद्रित संपादकीय लिखा है।