मौनी अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी
नारायणी नदी के पनियहवा घाट पर साधु-संतों और श्रद्धालुओं ने किया स्नान-दान
बांसी और छोटी गंडक के किनारे भी श्रद्धालुओं का उमड़ा सैलाब
पडरौना। मौनी अमावस्या पर बड़ी गंडक (नारायणी) नदी, छोटी गंडक और बांसी नदी में हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। शुक्रवार भोर में शुरू हुआ स्नान-दान दिनभर चलता रहा। श्रद्धालुओं ने गोदान कर पुण्य कमाया। मंदिरों में पूजा-अर्चना कर परिवार की सुुख-समृद्धि और खुशहाली की मंगलकामना की।
ज्योतिषाचार्य रवींद्रनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि माघ महीने की अमावस्या को मौनी अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन मौन रखकर नदियों में डुबकी लगाने का विधान है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्व है। इस मास को भी कार्तिक के समान पुण्य मास कहा गया है। मौनी अमावस्या पर कुशीनगर जिले के श्रद्धालु बड़ी गंडक के पनियहवा, भैसहां घाट, पिपराघाट समेत अन्य स्थलों पर डुबकी लगाते हैं। इसी तरह छोटी गंडक और बांसी नदी में भी श्रद्धालु स्नान करने के बाद दान-दक्षिणा देते हैं तथा पूजा-अर्चना करते हैं। यही नहीं यहां से काफी संख्या में भक्त नेपाल के त्रिवेणी में भी स्नान के लिए जाते हैं। आस्थावानों ने छोटी गंडक के हेतिमपुर, रगड़गंज समेत अन्य घाटों पर तथा बांसी नदी के बांसी घाट और रामघाट में भी डुबकी लगाई।
तमकुहीरोड प्रतिनिधि के अनुसार, सेवरही के शिवाघाट, पांडेय पट्टी घाट, गोला घाट, रुक्मिणी घाट, गौरी घाट, दमकल घाट, मलाही घाट, पिपराघाट समेत जंगली पट्टी, अहिरौलीदान, विरवट कोन्हवलिया, बाकखास, बाघाचौर, जवही दयाल आदि स्थानों पर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। इन घाटों पर श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला बृहस्पतिवार शाम से ही शुरू हो गया था। आलम यह था कि बृहस्पतिवार को शाम के बाद आने वाली सभी ट्रेनों में काफी भीड़ रही। यही हाल शुक्रवार को वापसी में भी रहा। लोग ट्रेन में जगह पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। सुबह स्नान के बाद भी ट्रेनों और अन्य वाहनों में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही।
मौनी अमावस्या पर श्रद्धालुओं ने लगाई नारायणी नदी में डुबकी
सामाजिक कुंभ के तीन दिवसीय आयोजन का हुआ समापन
फोटो के साथ
खड्डा। नारायणी नदी के तटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पवित्र स्नान किया। कड़ाके की ठंड पर आस्था भारी पड़ी। स्नान के बाद गोदान व अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए गए। मेले का भी आनंद लिया।
नारायणी नदी के पनियहवा घाट पर लगने वाले स्नान पर्व पर बृहस्पतिवार की शाम से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम शुरू हो गया और रात होते होते पूरा क्षेत्र खचाखच भर गया। शुक्रवार को ब्राह्ममुहूर्त से ही श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाना शुरू कर दी। पति-पत्नी गांठ बांधकर डुबकी लगा रहे थे तो तमाम लोग अपने परिजनों व मित्रों के नाम की डुबकी लगाते दिखे। पनियहवा तिराहे से नदी तट व सालिकपुर, महदेवा तक जन सैलाब दिख रहा था। तट पर मनौती पूरी होने पर कड़ाही चढ़ाना, मुंडन करना, कथा, आरती व गाय की पूछ पकड़कर वैतरणी पार करने की कामना के साथ आस्थावान लोगों की भीड़ तत्पर रही।
मेले में घरेलू सामान, प्रसाद, खिलौना व नेपाल से आने वाला मशहूर मशाला तेजपात भी खूब खरीदा गया। मेले में दशकों से मिठाई के रूप में आधिपत्य जमाए जलेबी का जलवा यहां भी कायम था। इसी तरह भैसहां घाट पर बने पीपा पुल के दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोग डुबकी लगाकर पुण्य के भागी बने। एशिया के सबसे बड़े ठोकर में शुमार बीरभार तट पर भी श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाने के बाद तट पर स्थापित प्राचीन दुर्गा मंदिर में दर्जन-पूजन किया। इस अवसर पर प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए थे।
नारायणी नदी को उचित सम्मान दिलाने का प्रण लिया
इस तीन दिवसीय आयोजन के अंतिम दिन संतों ने नारायणी के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने व इस क्षेत्र के विकास के लिए संकल्प प्रस्ताव पारित कर आगे भी इसे आयोजित करने का उद्घोष किया। 22 जनवरी से चल रहे आयोजन के अगुवा रामनयन दास व संयोजक मनोज पांडेय, कार्यक्रम प्रमुख प्रवीष गुंजन के साथ बड़ी संख्या में साधु-संतों ने शाही स्नान के बाद वैदिक रीति से नारायणी की स्तुति की और धार्मिक नारों का शंखनाद कर मेला क्षेत्र को भक्तिमय कर दिया। संतों ने इस पवित्र नदी को उचित सम्मान दिलाने का प्रण लिया। अन्य नदियों की भांति इसके किनारे बसे लोगों व आसपास के क्षेत्रों के विकास के साथ ही पर्यावरण को अक्षुण्ण करने को ज्योति जलती रहेगी। इस इलाके को केवल चेपुआ मछली के नाम से नहीं जाना जाए, इसे अब नारायणी धाम का रूप देकर पर्यटन के क्षेत्र में अग्रणी किया जाएगा। संत समाज ने सभी का आभार जताते हुए शासन प्रशासन व जनप्रतिनिधियों से सहयोग की अपील के साथ इस कुंभ मेले के समापन की घोषणा की गई।
सामाजिक कुंभ में पहुंचे श्रद्धालुओं ने भंडारे में ग्रहण किया प्रसाद
खड्डा। नारायणी (बड़ी गंडक) नदी के तट पर आयोजित मां नारायणी सामाजिक कुंभ 2020 के अंतिम दिन वृहद सहभोज का आयोजन हुआ। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।
संयोजक मनोज पांडेय ने कहा कि सहभोज से समरसता का मार्ग प्रशस्त होता है। समाज में ऊंच-नीच, जाति के बंधन से ऊपर उठकर आपसी भेदभाव को भुलाकर सामाजिक कुंभ 2020 के तीसरे व अंतिम दिन सहभोज में श्रद्धालुओं ने एक साथ बैठकर भोजन किया। इस कुंभ ने लोगों पर अमिट छाप छोड़ी है।
नारायणी स्थल पर लगी प्रदर्शनी
खड्डा। नदी के तट पर लदी प्रदर्शनी ने नारायणी के महत्व व आसपास के क्षेत्रों की अनूठी जानकारी से लोगों को परिचित कराया। इस प्रदर्शनी में नारायणी में प्राप्त होने वाले सालिग्राम पत्थर (ठाकुर जी) का दर्शन कराया व नदी के उद्गम स्थल व वहां से पनियहवा धाम तक पहुंचने तथा उसके आगे सोनपुर के पास गंगा नदी में नारायणी के मिलने तक की यात्रा की जानकारी लोगों को मिली। इसके साथ ही इसके किनारे पनपने वाली औषधीय वनस्पतियों व फसलों की जानकारी भी प्रदर्शित की गई।
कुंभ में पहुंचे थे संत
खड्डा। तीन दिनों तक चले इस सामाजिक कुंभ के अलावा आसपास के मंदिरों, मठों और देवालयों पर भी संतों की उपस्थिति देखी गई। संतो ने मौजूद श्रद्घालुओं को कुंभ के महत्व के बारे में बताया। संतो ने बताया कि वाल्मीकि आश्रम, नरदेवी, मदनपुर देवी, राजगढ़ी, कटबांसी, वीरभार देवी, भैसहां दुर्गा मंदिर, पथलेश्वर मंदिर, सिधरिया देवी, पानमती स्थान, बुलहवा स्थान, बौधी माई, फटकदौना की वन देवी, खड्डा कस्बे का काली मंदिर, एकडंगी गांव का शिवमंदिर आदि धार्मिक स्थल अरसे से आस्था के केंद्र हैं।