डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने बताया कि भगवान श्रीराम से जुड़ी बांसी और महात्मा बुद्ध से जुड़ी हिरण्यवती जिले की धार्मिक नदियां हैं। इनके संरक्षण के लिए एक जिला एक नदी योजना में चयन किया गया है। इन दोनों नदियों में वर्ष भर जलप्रवाह बना रहे इसके लिए हर संभव उपाय किए जाएंगे। सबसे पहले इसमें मौजूद जलकुंभी और सिल्ट आदि की साफ-सफाई कराई जाएगी। इसके लिए टॉस्क फोर्स का गठन कर दिया गया है।
जिले की दो महत्वपूर्ण नदियों बांसी और हिरण्यावती के दिन बहुरने वाले हैं। इन दोनों नदियों को एक जिला एक नदी के रूप में चयनित किया गया है। इन दोनों नदियों के जीर्णोद्धार कराने के लिए उनके उद्गम स्थल से समागम स्थल तक साफ-सफाई की जाएगी।
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उसमें निरंतर जलप्रवाह बना रहे इसके लिए दूसरी नदी या नहरों को इससे जोड़ा जाएगा। इसके लिए जिला प्रशासन टॉस्क फोर्स का गठन कर अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपा चुका है। बांसी नदी छितौनी बुलहवा से गंडक से निकलकर नकहवा, चिनबरदहा, पडरही, त्रिलोकपुर, बांसी के रास्ते बिहार में प्रवेश कर जाती है।
इस तरह 114 किलोमीटर की दूरी तय कर यह नदी पुन: यूपी के सेवरही ब्लॉक स्थित पिपरा घाट के पास गंडक नदी में विलीन हो जाती है। यह नदी अपने उद्गम स्थल से 84 किलोमीटर तक सिल्ट और जलकुंभी से पटी पड़ी है। शेष हिस्सा साफ है, जहां निरंतर जलप्रवाह बना रहता है।
इस नदी के शून्य से 60 किलोमीटर तक सिंचाई खंड द्वितीय और 60 किलोमीटर से 114 किलोमीटर तक का हिस्सा बाढ़ खंड की देखरेख में है। एक जिला एक नदी योजना के तहत इस नदी के चयन होने के बाद नदी की साफ-सफाई समेत इसमें निरंतर जलप्रवाह बन रहे इसके लिए योजना बनाई जा रही है।
किन-किन नदी, नहर और बरसाती नाले का पानी बांसी नदी में पानी लाने की व्यवस्था कराने और प्रथम चरण में बांसी में गिरे झरही नाला से कटाई भरपुरवा तक सफाई करने के निर्देश दिए गए हैं। इसी तरह हिरण्यवती नदी का उद्गम स्थल रामकोला ब्लॉक के सपहा गांव का ताल माना जाता है।
यहां से सिधावे, बसडीला, मोती पाकड़, कठघरही, परवरपार, अहिरौली कुसुम्ही से होते कुशीनगर तक पहुंचती है। कुशीनगर से आगे बढ़ने पर कुड़वा दिलीपनगर गांव में घाघी नदी से मिलती है। घाघी नदी आगे छोटी गंडक में जाकर मिलती है। तथागत बुद्ध का महापरिनिर्वाण हिरण्यवती नदी के तट पर हुआ था, जहां अब रामाभार स्तूप है। नदी की लंबाई करीब 49.370 किलोमीटर है।
भगवान राम ने बांसी नदी में किया था स्नान
बांसी नदी का इतिहास अति प्राचीन है। त्रेतायुग में इस पौराणिक पवित्र नदी का उद्भव छितौनी के पास बुलहवा से हुआ था। जनकपुर से लौटते समय भगवान श्रीराम, माता सीता के साथ अयोध्या जाते समय वे बरातियों के साथ रामघाट के पास रात्रि विश्राम किए थे।
अगले दिन सुबह नदी में स्नान भी किया था। भगवान राम ने स्नान के बाद रामघाट पर शिवलिंग स्थापित कर पूजा भी की थी। आज भी रामघाट पर शिव का मंदिर है। अब मंदिर का निर्माण करवा दिया गया है। भगवान राम की आस्था से जुड़े रामघाट पर मंदिर भी है।
रामघाट के महंत गोपाल जी दास ने बताया कि यह मंदिर सदियों पुराना है। वर्ष 2008 में मंदिर का निर्माण और सुंदरीकरण कार्य करवाया गया। मंदिर में भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत और हनुमान जी की प्रतिमा है। उन्होंने बताया कि रामघाट नदी में सदियों पहले खाकी दास महाराज सोने की नाव से आते जाते थे। उनके तरफ से ही भगवान राम और सीता सहित पूरा रामदरबार की स्थापना की गई है।
भगवान श्रीराम से जुड़ी बांसी और महात्मा बुद्ध से जुड़ी हिरण्यवती जिले की धार्मिक नदियां हैं। इनके संरक्षण के लिए एक जिला एक नदी योजना में चयन किया गया है। इन दोनों नदियों में वर्ष भर जलप्रवाह बना रहे इसके लिए हर संभव उपाय किए जाएंगे।
सबसे पहले इसमें मौजूद जलकुंभी और सिल्ट आदि की साफ-सफाई कराई जाएगी। इसके लिए टॉस्क फोर्स का गठन कर दिया गया है। इन नदियों में निरंतर जलप्रवाह बना रहे इसके लिए उपलब्ध संभावनाओं की तलाश की जा रही है। शीघ्र ही सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे: महेंद्र सिंह तंवर, डीएम, कुशीनगर