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Kushinagar News: दूध बेचकर कर पिता ने बेटियों को बनाया पहलवान, जिले का नाम कर रहीं रोशन

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मथौली। पिता के संघर्ष, बेटियों की मेहनत और परिवार के अटूट विश्वास का ही परिणाम है कि आज यादव परिवार की बेटियां राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रही हैं। फादर्स डे के अवसर पर यह परिवार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि पिता का विश्वास और त्याग बच्चों के सपनों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। मथौली नगर पंचायत के वार्ड नंबर 11 सुभाष चंद्र बोस नगर निवासी मदन यादव ने इस कहावत को अपने जीवन में चरितार्थ कर दिखाया है। दूध बेचकर परिवार का भरण-पोषण करने वाले मदन यादव ने अपनी बेटियों को पहलवान बनाने का सपना देखा और आज उनकी बेटियां राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती में जिले, प्रदेश और परिवार का नाम रोशन कर रही हैं।
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मदन यादव की कहानी उन तमाम पिता के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों के सपनों को उड़ान देने में जुटे हैं। आर्थिक चुनौतियों के बीच उन्होंने कभी अपनी बेटियों के हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। परिणाम यह है कि उनकी बेटियां आज राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही हैं। मदन यादव के परिवार में चार बेटियां और एक बेटा हैं। बड़ी बेटी अंगीरा यादव (26) बीए उत्तीर्ण हैं और प्रदेश स्तर तक कुश्ती खेल चुकी हैं। वर्तमान में वह सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही हैं। बेटा पन्नीलाल यादव भी वर्ष 2012 में राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग कर चुके हैं और फिलहाल स्नातक के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। तीसरे नंबर की बेटी आंचल यादव (18) इंटरमीडिएट उत्तीर्ण हैं और वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती खेल रही हैं। उन्होंने पंजाब, भटिंडा, पुणे, चंडीगढ़, मोहाली, सोनीपत और पटना में आयोजित प्रतियोगिताओं में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। वहीं अंकिता यादव (17) ने वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश स्तरीय प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर राष्ट्रीय प्रतियोगिता में स्थान बनाया। वह भी वर्तमान में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही हैं। सबसे छोटी बेटी अमृता यादव (16) ने वर्ष 2025 की उत्तर प्रदेश राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतकर राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए चयन हासिल किया। वह इन दिनों दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं। मदन यादव बताते हैं कि बेटियों को पहलवान बनाने का सपना उन्होंने तब देखा, जब गांव में लड़कियों के खेलों में आगे बढ़ने को लेकर सकारात्मक माहौल नहीं था। घर के पास स्थित इंटर कॉलेज के अखाड़े में वह रोज सुबह-शाम बेटियों को अभ्यास कराने ले जाते थे। शुरुआत में गांव और क्षेत्र के लोग उनका मजाक उड़ाते थे। लोग कहते थे कि जब दूसरे लोग बेटियों को अधिकारी और सरकारी नौकरी के लिए पढ़ा रहे हैं, तब वह उन्हें पहलवान बनाने में लगे हैं। मदन यादव ने लोगों की बातों को नजरअंदाज कर अपनी बेटियों के सपनों को प्राथमिकता दी। उनका कहना है कि वह लोगों को जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कर्म और बेटियों की उपलब्धियों से देना चाहते थे। आज उनकी बेटियों की सफलता ने आलोचकों को भी प्रशंसक बना दिया है।
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