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Ground Report: महंगाई की मार से गांवों में फिर जलने लगे लकड़ी के चूल्हे, महिलाएं बोलीं- बिगड़ गया बजट

Thu, 28 Jul 2022 09:34 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर।

सार

कुशीनगर जिले में उज्जवला योजना के कुल दो लाख 68 हजार लाभार्थी हैं। वर्ष 2016 में जब योजना शुरू की गई तो रसोई गैस के दाम 656 रुपये प्रति सिलिंडर था। वर्ष 2022 के जुलाई माह में सिलिंडर की कीमत 1065 रुपये पहुंच गई है। इस वजह से लाभार्थी सिलिंडर नहीं भरा पा रहे हैं।
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चूल्हे पर खाना बनाती महिला। - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार
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अप्रैल से लगातार महंगाई बढ़ रही है। रसोई गैस से लेकर पेट्रोल-डीजल के दाम में वृद्धि हुई है। दाल, तेल, आटा, सब्जी, चीनी और मसाला से लेकर अन्य वस्तुओं के दाम में भी वृद्धि हुई है। यहां तक की मोबाइल, टीवी का रिचार्ज, बैंक लोन पर ब्याज में भी इजाफा हुआ है। इसके सापेक्ष आमदनी में खास बढ़ोतरी नहीं हुई है। महंगाई की मार से हर वर्ग बेहाल है। ज्यादा परेशान मध्यम वर्गीय परिवार है।

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कुशीनगर जिले में उज्जवला योजना के कुल दो लाख 68 हजार लाभार्थी हैं। वर्ष 2016 में जब योजना शुरू की गई तो रसोई गैस के दाम 656 रुपये प्रति सिलिंडर था। वर्ष 2022 के जुलाई माह में सिलिंडर की कीमत 1065 रुपये पहुंच गई है। इस वजह से लाभार्थी सिलिंडर नहीं भरा पा रहे हैं। मजबूरन उन्हें लकड़ी के चूल्हे पर भोजन पकाना पड़ रहा है।

लगातार दाम में वृद्धि से महिलाओं ने सिलिंडर से बनाई दूरी
महिलाओं को धुएं से निजात दिलाने के लिए उज्ज्वला योजना के तहत सिलिंडर बांटे गए थे। लेकिन लगातार गैस के दामों में वृद्धि से गृहिणियों ने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में फिर से लकड़ी के चूल्हे जलने लगे हैं। खाली सिलिंडर धूल फांक रहे हैं। कई लोगों ने यह सिलिंडर दूसरों को दे दिया है। लाभार्थियों का कहना है कि रसोई गैस की लगातार बढ़ती कीमतों के बीच सिलिंडर भरा पाना अब उनके बस में नहीं है।
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बिंदवलिया गांव में मुसहर बस्ती में सभी घरों में लकड़ी पर खाना बन रहा है। पुष्पा, सरिता, दुलारी और महिमा ने बताया कि गैस कनेक्शन तो मिल गया, लेकिन उसका लाभ नहीं मिल रहा है। तीन-तीन महीने में कभी कभार भरवाते हैं। गर्मी के दिनों में घर के बाहर खाना बनाते हैं। जब घर में नया सिलिंडर आया था, उसी समय एक महीने खाना बनाया गया था। उसके बाद सिलिंडर से खाना नहीं बना।

 

मध्यवर्गीय परिवार का एक महीने का खर्च

मध्यवर्गीय परिवार में पांच से आठ लोग हैं। कमाने वाला सिर्फ एक व्यक्ति, वह भी प्राइवेट। इनके लिए जीवन यापन करना मुश्किल हो गया है। वहीं प्रति एक व्यक्ति का फोन रिचार्ज 200 रुपये है। पांच लोग हैं तो 1000 रुपये खर्च होते हैं। पढ़ाई, राशन, गैस सिलिंडर, सब्जी, फल और दवा पर करीब 10 से 15 हजार रुपये एक महीने का खर्च आ रहा है।
  • पेट्रोल खर्च- 1200-1500
  • गैस सिलिंडर-1123-1160
  • स्कूल खर्च- 1000-1500
  • राशन 2000-3000
  • मोबाइल व टीवी 600-800
  • सब्जी व फल 1000-1500
  • अन्य खर्च 500-1000

चूल्हे पर बना रहे खाना

सेंदुरिया बुजुर्ग निवासी गृहिणी मधु गुप्ता ने कहा कि 10 लोगों का भरा पूरा परिवार है। केवल पति ही प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। उनका मासिक वेतन 15 हजार रुपये है। इस महंगाई में परिवार का भरण-पोषण करने में दिक्कतें आ रही हैं। इस समय सिलिंडर 1123 रुपये हो गए हैं। साथ ही हॉकर को 30 रुपये अतिरिक्त देना पड़ता है। सिलिंडर महंगा होने की वजह से चूल्हे पर दोबारा खाना बनाना शुरू कर दिया है। बच्चों की पढ़ाई पर पहले 3000 रुपये फीस पर खर्च आता था, लेकिन अब स्कूल फीस के साथ ही कॉपी किताबों के भी खर्च बढ़ गए हैं। अब फीस करीब 3800 से 4500 रुपये तक पहुंच गई है।

 
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दो कमाने वाले, फिर भी घर का खर्च चलाना मुश्किल

प्राइवेट शिक्षक अनुष्का चौरसिया ने कहा कि सात लोगों का परिवार है, दो लोग प्राइवेट संस्था में कमाने वाले हैं। दोनों का वेतन मिलाकर घर चलाना मुश्किल हो रहा है। पेट्रोल, दवा और राशन की वस्तुओं के दामों में वृद्धि हो गई है। राशन की सामग्री जहां पांच किलो खरीदी जाती थी, अब दो किलो खरीदी जा रही है। पूर्व में होने वाली बचत का आधा हिस्सा, इस बढ़ी महंगाई में खर्च हो रहा है। गैस के दाम हर महीने बढ़ रहे हैं।

महंगाई बढ़ी, मनरेगा की मजदूरी नहीं
मनरेगा मजदूर सफरुद्दीन अली ने कहा कि आठ लोगों का परिवार है। आए दिन मगंगाई बढ़ रही है। इससे घर खर्च चलाना मुश्किल हो गया है। साहूकार से कर्ज लेकर बच्चों का फीस जमा करना पड़ता है। सरकार को महंगाई के साथ मनरेगा मजदूरी भी बढ़ानी चाहिए। मनरेगा मजदूरी आज भी 204 रुपये है।

दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार चलाना कठिन
मजदूर हाकिल अली ने बताया कि सात लोगों का परिवार है, परिवार में एक मैं ही कमाने वाला इकलौता सदस्य हूं। गांवों में जाकर मजदूरी करता हूं। दाम बढ़ने से सिलिंडर भरवा पाना मुश्किल हो गया है। कार्य नहीं मिलने पर भोजन में भी कटौती करनी पड़ती है।

 
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