-एक सप्ताह में तीन मौतों ने बढ़ाई चिंता, सोशल मीडिया और गेमिंग को ही युवा मान बैठे हैं असली जिंदगी
पडरौना। छोटी-छोटी बातों पर किशोरों और युवाओं का मौत को गले लगाना गंभीर चिंता का विषय बन गया है। महज एक सप्ताह के भीतर दो किशोरियों और एक युवक ने आत्महत्या कर ली। सभी मामलों में खुदकुशी की वजह कोई बड़ी परेशानी नहीं, बल्कि मोबाइल चलाने से मना करना या घर वालों की मामूली डांट थी। इन घटनाओं में यह बात सामने आई है कि जब अभिभावकों ने उन्हें सोशल मीडिया व गेमिंग के रोका जा रहा है तो वह आत्मघाती कदम उठा ले रहे हैं।
स्थिति यह है कि बच्चे इतने भावुक और गुस्से वाले हो गए हैं कि माता-पिता की कही बातों को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। जरा सी बात पर घर में झगड़ा करना और फिर गुस्से में आकर आत्मघाती कदम उठा लेना। यह अब खतरनाक चलन बनता जा रहा है। इन घटनाओं ने न सिर्फ पीड़ित परिवारों को झकझोर दिया है,बल्कि अभिभावकों को भी सोचने व विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि ऐसे हालात में वह मामलों का किस तरह सुलझाएं और इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके।
जिले में हुई हालिया घटनाओं में सामने आया कि जब परिजनों ने बच्चों से मोबाइल फोन छीना या फोन पर ज्यादा बात करने से टोका, तो उन्होंने उसे दिल से लगा लिया और बिना सोचे-समझे अपनी जिंदगी खत्म कर ली।
केस एक :
19 अप्रैल 2026 : अहिरौली क्षेत्र की एक किशोरी किसी परिचित से फोन पर लंबी बात कर रही थी। भाई ने फोन देख लिया और उसे डांटा कि पढ़ाई पर ध्यान दो वरना फोन छीन लिया जाएगा। इस बात से आहत होकर उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया और आत्मघाती कदम उठा लिया।
केस 2:
22 अप्रैल 2026 : कसया क्षेत्र की एक किशोरी को मोबाइल पर गेम खेलने की लत लग गई थी। मां ने सुबह जल्दी उठने और पढ़ाई करने की बात कहकर मोबाइल छीन लिया। इस बात से नाराज होकर किशोरी अपने कमरे में गई। छत के पंखे से फंदा लगाकर जान दे दी थी।
केस 3 :
24 अप्रैल 2026 : तुर्कपट्टी क्षेत्र का एक युवक दोस्तों के साथ बाहर घूमता रहता था। उसे अपने घर के कामों से कोई सरोकार नहीं था। जब पिता ने उसे काम के लिए डांट लगाई तो वह बिना सोचे-समझे घर से बाहर निकला और विषाक्त पदार्थ खा लिया। तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे अस्पताल ले जा रहे थे कि रास्ते में ही मौत हो गई।
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क्या कहते हैं विशेषज्ञ:-
युवाओं में घटता धैर्य और अकेलापन आत्मघाती कदम उठाए जाने की प्रमुख वजह है। युवाओं में आवेग पर नियंत्रण की भारी कमी देखी जा रही है। बच्चे डिजिटल दुनिया में इतने डूबे हैं कि वास्तविक संवाद खत्म हो गया है। जब उन्हें किसी चीज के लिए मना किया जाता है, तो वे उसे अपनी आजादी पर हमला मानते हैं। उनमें सहनशीलता का स्तर गिर गया है, जिससे गुस्से में वे ऐसे आत्मघाती निर्णय ले लेते हैं। -डाॅ. उज्ज्वल, मनोचिकित्सक
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कम संवाद और सामाजिक दबाव के चलते युवा वर्ग आत्मघाती होता जा रहा है। संयुक्त परिवारों का टूटना और एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता बच्चों को अकेला बना रही है। संवाद की कमी सबसे बड़ा कारण है। बच्चों के पास अपनी बात कहने का मंच नहीं है। मोबाइल ही उनका साथी है, और जब वही छिन जाता है, तो उन्हें दुनिया खत्म होती नजर आती है। माता-पिता को दोस्त बनकर उनसे बात करने की जरूरत है। -डाॅ. नरेंद्र त्रिपाठी, समाजशास्त्री
माता-पिता को विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों के अनुसार, अभिभावकों व परिवार के बड़े सदस्यों को भी अपने कार्य व्यवहार में बदलाव करने की जरूरत है। बच्चों के साथ प्रतिदिन कुछ समय निकालकर उनसे बातचीत करें। उनकी किसी छोटी गलती पर सार्वजनिक रूप से न डांटे। उनके व्यवहार में आए बदलाव जैसे चुप रहने और कम खाने पर गैर करें। उनसे सीधे मोबाइल छीनने की जगह स्क्रीन टाइम धीरे-धीरे कम करें। उनकी भावनाओं को भी तरजीह दें और सुनें। उनकी किसी से तुलना न करें।