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दिनभर उपवास, फिर भी चेहरे पर उल्लास

Wed, 25 Oct 2017 11:41 PM IST
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
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बाजार में खरीदारी करते लोग। - फोटो : कुश्‍ाीनगर ब्यूरो
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पडरौना।      दिनभर उपवास, फिर भी चेहरे पर उल्लास लिए छठ व्रत रखने वाली औरतों का उत्साह देखते ही बन रहा था। इनके उत्साह को देखकर सत्य ही लग रहा कि आस्था में तर्क की कोई जगह नहीं होती। बुधवार को पूरे दिन व्रत के बावजूद बाजार से लेकर घर के कार्यों में जुटी व्रती महिलाएं जगह-जगह समुह बनाकर छठ की गीत भी गाती रहीं। इससे छठ घाट से लेकर मुहल्लों तक माहौल बुधवार से ही भक्तिमय हो गया।
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सूर्योपासना के इस व्रत में बुधवार को दिनभर व्रत रखने के बाद देर शाम को महिलाओं ने खीर खाया उसके बाद पुन: लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो गया। गुरुवार की शाम को छठ घाटों पर औरतें डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगी, फिर शुक्रवार को सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही व्रत को तोड़ेंगी।

 श्रद्घालुओं ने पूरे दिन व्रत रखकर विधि विधान से घर में ही पूजा किया तथा संतानों की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्घि की कामना की। छठ पर्व वैसे तो मंगलवार को ही प्रारंभ हो गया था, लेकिन इसका पहला उपवास बुधवार को किया गया। व्रती महिलाओं और अन्य श्रद्घालुओं ने सुबह स्नान करने के बाद माता सूर्यषष्ठी और सूर्यदेव का ध्यान कर उनकी विधिवत पूजा-अर्चना की तथा अपनी संतानों को सभी कष्टों से दूर रखने की प्रार्थना की। दिन भर उपवास के बाद रात में इन श्रद्घालुओं ने मीठा भोजन, खीर रोटी, दूध अथवा जूस का सेवन किया। इसी के बाद दूसरे दिन का उपवास भी प्रारंभ कर दिया। अब इन श्रद्घालुुओं को शुक्रवार को प्रात: भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण करना है। बृहस्पतिवार केे दिन में इस पूजा से संबंधित पकवान बनाए जाएंगे। दोपहर बाद व्रती महिलाएं पूजन सामग्री के साथ छठ घाटों पर पहुंचेंगी और डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगी। रात में घरों में कोशी भरने का कार्य होगा। 
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 छठ पर्व का महत्व 
जनपद के जरार गांव के निवासी शास्त्री रवींद्रनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि 26 अक्टूबर दिन बृहस्पतिवार को छठ पूजा है। इस दिन मुख्य रूप से भगवान सूर्य की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में सूर्य को साक्षात् भगवान माना गया है, क्योंकि वह रोज हमें दर्शन देते हैं और उन्हीं के प्रकाश से हमें जीवनदायिनी शक्ति प्राप्त होती है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, रोज सूर्य की उपासना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। 

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पूजा विधि 
रविंद्र नाथ त्रिपाठी ने बताया कि सूर्यषष्ठी को सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर शौच आदि कार्यों से निवृत्त होकर नदी के तट पर जाकर आचमन करें तथा सूर्योदय के समय शरीर पर मिट्टी लगाकर स्नान करें। इसके बाद पुन: आचमन कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और सप्ताक्षर मंत्र- ॐ खखोल्काय स्वाहा से सूर्यदेव को अर्घ्य दें।  इसके बाद भगवान सूर्य को लाल फूल, लाल वस्त्र व रक्त चंदन अर्पित करें। धूप-दीप दिखाएं तथा पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं। अंत में हाथ जोड़कर सूर्यदेव से प्रार्थना करें। सूर्याष्टक पाठ करना भी इस व्रत में विशेष फलदाई माना जाता है।  

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कब मनाई जाती है सूर्यषष्ठी: 
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान सूर्य की पूजा करने का विधान है। इस पर्व को सूर्य षष्ठी व्रत के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह व्रत 26 अक्टूबर को है। यह दिन सूर्य की पूजा और उससे जुड़े उपाय करने के लिए खास माना जाता है। 
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ऐसे शुरू हुई थी छठ पूजा की परंपरा 
मान्यताओं के अनुसार छठ पूजा के लिए कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से एक प्रमुख है कि विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने की सलाह दी। इसके बाद सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव की पूजा की थी। इसके बाद से ही यह पर्व मनाया जाता है। इस बार छठ पूजा का पर्व 24 अक्टूबर से शुरू होकर 27 अक्टूबर तक मनाया जाएगा। मुख्य पूजा 26 अक्टूबर को की जाएगी। 
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