कसया। बुद्ध पीजी काॅलेज के एनएसएस के विशेष शिविर के चौथे दिन बौद्धिक सत्र में पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता विषय पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने पौधारोपण के साथ उसके संरक्षण को जनांदोलन बनाने पर जोर दिया।
मुख्य अतिथि कृष्ण कुशवाहा ने हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस पर लगाए गए पौधों का संरक्षण करते हुए अगले वर्ष उसी पौधे के साथ सेल्फी साझा करने का सुझाव दिया। कहा कि इससे वास्तविक पर्यावरणीय संवेदनशीलता का आकलन हो सकेगा। उन्होंने कहा कि पौधारोपण जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उसका संरक्षण है, क्योंकि लगाए गए पौधों में से अधिकांश एक वर्ष के भीतर नष्ट हो जाते हैं।
उन्होंने विवाह, जन्मदिन, वर्षगांठ जैसे अवसरों पर पौधा भेंट करने की परंपरा शुरू करने का सुझाव दिया। कहा कि विकास हमेशा पर्यावरण का विरोधी नहीं होता, बल्कि सह-अस्तित्व की भावना के साथ सतत विकास का मार्ग अपनाया जा सकता है। प्रकृति से जितना लें, उतना ही संवेदनशील तरीके से लौटाने का संकल्प भी जरूरी है। मुख्य वक्ता डॉ. शंभू दयाल कुशवाहा ने कहा कि प्रकृति में हो रहे क्षरण को मानवीय संवेदना के साथ समझना ही सच्ची पर्यावरणीय संवेदनशीलता है।
उन्होंने कहा कि सतत विकास की अवधारणा संसाधनों के संवेदनशील उपयोग के बिना संभव नहीं है। प्रकृति हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकती है, लेकिन लालच की नहीं। विकसित देशों द्वारा आर्थिक प्रगति के नाम पर विकासशील देशों के प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंची है, जिससे मानवता संकट में है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वनस्पति शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ. अनुज कुमार ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता ही वास्तविक संवेदनशीलता है। उन्होंने ‘तीन पी’ प्लास्टिक, पानी और पेड़ के प्रति सजग रहने की अपील की। कहा कि पर्यावरण को नियंत्रित करने के बजाय उसके साथ सहचर भाव से जीना सीखना होगा। कार्यक्रम का संचालन स्वयंसेविका मुस्कान शर्मा ने किया। अतिथियों का परिचय एवं स्वागत कार्यक्रम अधिकारी डॉ. निगम मौर्य ने कराया, जबकि आभार ज्ञापन डॉ. पारस नाथ ने किया।