पडरौना। लोगों की जिंदगी में मिठास पहुंचाने के लिए दिन रात एक कर वर्षों मजदूरी की। उम्मीद थी कि सेवानिवृत्त होने के बाद उनके रुपये उन्हें मिलेंगे और बुढ़ापा आराम से कटेगा। जवानी तपाकर बुढ़ापा सुखमय बनाने के सपने सजोने वाले चीनी मिल मजदूरों में एक मजदूर की मौत दवा के अभाव में हो गई तो दूसरा मजदूर मेडिकल कॉलेज में जिंदगी के लिए जंग लड़ रहा है।
एक मजदूर की मौत के बाद 118 मजदूर अब भी चीनी मिल में कार्यरत हैं। वेज बोर्ड के मजदूरों के लिए व्यवस्था है कि सेवानिवृत्त होने के बाद जब तक उन्हें उनके सभी देनदारियों का भुगतान नहीं दिया जाएगा, तब तक वे ड्यूटी पर माने जाएंगे। इसी व्यवस्था के तहत सेवानिवृत्त मजदूर भी कार्य कर रहे हैं। 1976 से चीनी मिल में कार्यरत बेल्डर शुभेंद्र चटर्जी अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। हृदय रोग से पीड़ित शुभेंद्र पेसमेकर के साथ जीवित हैं। इनका कहना है कि चीनी मिल पर उनका लगभग पांच लाख बकाया है और पंाच हजार उनके पास नहीं हो पा रहा है कि वे अपना चेकअप करा लें। ब्वॉयलर अटेंडेंट पद पर कार्य करने वाले रामाकांत पांडेय का कहना है कि उनका इस चीनी मिल पर लगभग छह लाख रुपये बाकी हैं। लेकिन परिवार के सामने दो जून की रोटी की संकट है। चीनी मिल में मोटर अटेंडेंट पद से सेवानिवृत्त हुए बल्ली का कहना है कि उनको पैरालसिस हैं। बड़ी मुश्किल से चल पाते हैं। 2012 में रिटायर होने के बाद से अब तक चीनी मिल ने एक भी रुपये देनदारी के नहीं दिए। अब तो दवा भी बंद हो गई है। त्योहारों की खुशियां इनके लिए गुजरे जमाने की बात हो गई है। 1975 से चीनी मिल में इंजन ड्राइवर के पद पर कार्य करते हुए सेवानिवृत्त होने वाले मोबीन अली का कहना है कि उनके सामने परिवार की परवरिश का संकट आ गया है। बच्चों की पढ़ाई बंद हो गई है। यही दुआ करता हूं कि परिवार में किसी की तबीयत न खराब हो, वरना उसके बाद क्या होगा, खुदा जाने? सबसे खराब स्थिति चीनी मिल के वर्कशाप में कभी कार्य करने वाले मुस्तफा की है। तबीयत खराब होने के बाद से उनकी हालत बिगड़ती गई। रुपये के अभाव में समय से इलाज नहीं हो सका। अब उनकी हालत बहुत खराब हो गई है। मजदूर बताते हैं कि गांव और आस-पास के लोगों के सहयोग से उन्हें इलाज के लिए मेडिकल कॉलेज ले जाया गया है, जहां वे जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। इसी प्रकार चीनी मिल में टर्नर पद पर कार्य करने वाले राजेंद्र लाल श्रीवास्तव के पत्नी की तबीयत काफी खराब हो गई है। शहर के ही एक प्राइवेट अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। मजदूरों का कहना था कि वे बेवश हैं कि अपने साथियों की कोई मदद नहीं कर पा रहे हैं। उनके सामने ही एक-एक कर उनके साथी दम तोड़ रहे हैं और वे कितने बेबस और लाचार हैं कि कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं। मजदूरों के वेतन को लेकर चीनी मिल पर दो-दो बार आरसी हो चुकी है।