पडरौना (कुशीनगर)। देसी घी हमारे भोजन के महत्वपूर्ण व्यंजनों में से है। इसकी मौजूदगी न केवल भोजन का स्वाद बढ़ा देती है, बल्कि यह शरीर को भी स्वस्थ और बलवान बनाने का माद्दा रखती है। त्योहारों पर तो इसकी खपत और भी बढ़ जाती है। लोगों की इन्हीं भावनाओं की मार्केटिंग करने वाले घी में मिलावट भी करते हैं। अगर घी सिंथेटिक है तो यह न केवल शरीर को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जेब को भी बड़ी चपत लगाता है।
जिले में देसी घी बनाने का कोई बड़ा हब, मार्केट या प्रतिष्ठान नहीं है। पशुपालक घरों में दूध की मलाई और दही से घी निकालते हैं। इसमें भी दही से बना घी सबसे बेहतर माना जाता है। पडरौना नगर के मिष्ठान व्यवसायी विजय मद्घेशिया बताते हैं कि 250 लीटर शुद्ध दूध हो तो एक किलोग्राम देसी घी तैयार हो सकता है, जिसकी कीमत 700 से 800 रुपये प्रति किलोग्राम होती है। इसके विकल्प के रूप में फार्चून, पॉम ऑयल और डालडा भी लोग त्योहारों में इस्तेमाल करते हैं।
दुग्ध उत्पादन समिति के दुग्ध निरीक्षक दयाराम बताते हैं कि जिले में देसी घी तैयार करने वाला कोई फर्म नहीं है। कुशीनगर, देवरिया और महराजगंज जिले का दूध एकत्र कर गोरखपुर के नौसढ़ भेजा जाता है, जहां स्थित चिल्ड सेंटर में दूध से घी, मक्खन, क्रीम सहित अन्य उत्पाद बनाए जाते हैं। इस वजह से कुशीनगर जिले में घरेलू स्तर पर तैयार किए जाने वाले देसी घी में मिलावट की बहुत कम गुंजाइश होती है।