खड्डा (कुशीनगर)। सेना हो या अन्य जगह हर जगह महिलाएं अपना परचम लहरा रही हैं। यही नहीं महावत के कार्य में भी आज की बेटियां पीछे नहीं हैं। अभी इसका उदाहरण रविवार को सुनयना ने दिया, जब गैंडा को पकड़ने के लिए आई हाथी बिगड़ गई और पुरुष महावतों के बस की बात नहीं रही। तब सुनयना ने खुद आगे आकर हाथी को पकड़ लिया।
जन्म से ही हाथियों के साथ पली-बढ़ी सुनयना नेपाल के चितवन प्राणी उद्यान के जंगलों में अपने हाथी के साथ वह सभी कार्य करती है, जो पुरुष महावत करते हैं। रविवार को जब गैंडा पकड़ने आया उसका बहादुर नाम का हाथी बिदक गया और हालात बेकाबू होने लगे तो इस महिला ने उसे बड़ी समझदारी और बहादुरी से काबू में कर लिया। नेपाल वापस लौटते समय सोमवार को हाथी की महावत सुनयना से ‘अमर उजाला’ ने वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में विशेष बातचीत की।
आम तौर पर यही देखा जाता है कि हाथियों के महावत पुरुष ही होते हैं, लेकिन हाथियों के बीच महिला महावत देखकर लोग काफी हैरत में थे। वह भी पिपरासी में जिस बिदके हाथी को अन्य पुरुष महावत नहीं संभाल पाए, उसे सुनयना नाम की इस महिला महावत ने मना लिया। नेपाल के चितवन प्राणी उद्यान के सरकारी विभाग में तैनात इस महिला महावत का पूरा नाम सुनयना दोनवार पंजियार है। सुनयना बताती हैं कि उनके पिता नरायन दोनवार भी महावत थे। उनके साथ बचपन में हाथियों से खेलते और उनकी सवारी करते लगाव हो गया। तभी उन्होंने ठान लिया कि वह भी अपने पिता की भांति महावत का कार्य करेंगी। हालांकि सुनयना के लिए यह आसान नहीं था, लेकिन उनकी जिद्द के कारण पिता ने अधिकारियों से बात की और मंजूरी मिल गई।
यह बात अलग है कि सुनयना की बेटी का महावत बनने का कोई इरादा नहीं है, जो कक्षा नौ में पढ़ रही है। सुनयना बताती हैं कि भोर में चार बजे उठना पड़ता है। उसके बाद हाथी के पास साफ सफाई करने के बाद उसे लेकर जंगल में जाती हैं और चारा काटकर उसे हाथी पर लादकर लाती हैं। सात बजे सुबह घर पहुंचकर अपना दैनिक कार्य करने के बाद हाथी पर सवार होकर अकेले जंगल की रखवाली को निकल पड़ती हैं।
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15 वर्ष लिया प्रशिक्षण
सुनयना ने लगभग पंद्रह वर्ष प्रशिक्षण लिया और उनके जिम्मे (बहादुर गज) नाम के हाथी की देखभाल की जिम्मेदारी मिली, जो अब तक उनके साथ है। बहादुर उनकी हर बात ऐसे मानता है, जैसे कोई इंसान हो। उठने, बैठने, रुकने, तेज चलने, मुड़ने आदि के इशारे का वह झट से पालन करता है। हालांकि कभी कभी नाराज हो जाता है, तो मान भी जाता है।
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दूसरी महिलाओं के लिए आदर्श है सुनयना
सुनयना चितवन प्राणि उद्यान के लिए एक आदर्श की भांति हैं, जिन्हें देखकर चितवन प्राणि उद्यान में अब छह अन्य महिला महावत भी तैनात हो चुकी हैं। मात्र कक्षा पांच तक पढ़ी सुनयना के जीवन में अहम मोड़ तब आया, जब उनके घर के बगल में ही युवा महावत ठागा पंजियार (निवासी हड़ीपूर, जिला सरलाही, नेपाल) आकर रहने लगे। धीरे-धीरे दोनों में नजदीकी हुई, जिसके बाद घरवाले उनकी शादी कर दिए। इन दोनों की चौदह साल की एक बेटी भी है। सुनयना के पति हाथी के कमांडर हैं।
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हर कदम सुनयना का साथ देता हाथी
सुनयना का कहना है कि जंगल में शिकारियों व तस्करों को पकड़ने के लिए वह घूमती रहती हैं। कभी कभी बाघ, भालू, गैंडा, जंगली भैंसा जैसे हिंसक जानवरों से सामना हो जाता है। उस समय उनका हाथी काफी होशियारी से उनको खदेड़ देता है। बाढ़ में नेपाल से बहकर भारत में आए गैंडा के समूह को पकड़ने के लिए हाथियों का दस्ता नेपाल से आकर उन्हें पकड़ने में लगा है। इस दस्ते में पांच हाथी हैं, जिनमें बहादुर गज नाम के हाथी की महावत सुनयना हैं। हाथी शंकर प्रसाद के महावत शिखाराम महतो, कृष्णा प्रसाद के महावत सिकिंद चौधरी, शेर प्रसाद के महावत टेक बहादुर श्रेष्ठ और सूर्य गज नाम के हाथी के महावत का नाम हरिकृष्ण चौधरी है। यह सभी नेपाल के निवासी हैं। सुनयना जब बहादुर गज की सवारी करती हुई निकलती हैं तो लोग वह दृश्य देखते रह जाते हैं।