कुशीनगर। गंडक नदी के किनारे बसे खड्डा क्षेत्र के एक दर्जन गांव बरसात के चार महीने टापू बन जाते हैं। ऊफनाई गंडक नदी कभी इनके खेत को निगल जाती है तो कभी मकान को। इन चार महीनों में अगर गांव में कोई बीमार पड़ गया तो उसको इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाना किसी जंग से कम नहीं है। महज आठ किलोमीटर दूर खड्डा कस्बे तक पहुंचने के लिए लोगों को जंगल व पानी के बीच करीब 20 किलोमीटर पैदल चलकर बिहार के रास्ते एनएच 28 बी तक आना पड़ता है।
खड्डा ब्लॉक का कुछ हिस्सा गंडक नदी की तलहटी में है। बिहार बार्डर से सटा यह इलाका हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी झेलता है। लंबे समय तक सुर्खियों में रहे इस इलाके के गांव मरचहवा में वर्ष 1989 में जंगल पार्टी के डकैतों ने 14 लोगों को एक लाइन में खड़ा करके गोली मार दी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने दो साल के अंदर इस क्षेत्र के विकास का आश्वासन दिया था, लेकिन ढाई दशक बाद भी बाढ़ से बचाने की बात कौन कहे, इन गांवों में जाने के लिए बढ़िया सड़क तक नहीं बन पाई।
बाढ़ प्रभावित इस इलाके में बरसात के चार महीने स्कूल में छुट्टी रहती है। वजह यह कि गांव के साथ स्कूल में भी पानी भर जाता है। गांव से पानी घटता है तो भी रास्ता नहीं होने की वजह से अध्यापक स्कूल नहीं जाते। ग्रामीण कन्हैया, पारस, चंद्रभान बताते हैं कि मरचहवा दक्षिण टोला व बसंतपुर स्थित परिषदीय स्कूल में शिक्षक ही नहीं पहुंच पाते।