पडरौना। जिम्मेदारों ने चौपाल लगाई। योजनाएं गिनाईं, लेकिन पात्रों तक पहुंचाना भूल गए। यह दर्द हाता धुरिया गांव के गिधवा मुसहर बस्ती के लोगों की है। अंधेरे के आगोश में फूस की झोपड़ी में रहना, देसी हैंडपंप का दूषित पानी पीना और काम की तलाश में भटकना। इनका यही जीवन है।
तमकुहीराज विकास खंड के हाता धुरिया के टोला गिधवा की मुसहर बस्ती में 80 परिवार हैं। आबादी करीब 1000 है। गांव के जगरनाथ, भरत, शिवनाथ, सुरेश बताते हैं कि चौपाल लगाकर मुसहरों के कल्याण के लिए सरकार की तरफ से संचालित योजनाएं तो बताई गईं, लेकिन इनका लाभ न मिला। चुनाव में यहां आने वाला हर नेता भी वादे करता है, बाद में सब भूल जाते हैं। पांच-छह वर्ष पूर्व कुछ गिने-चुने लोगों को इंदिरा आवास मिले थे। बाकी के लिए झोपड़ी और पेयजल के लिए देसी हैंडपंप का ही सहारा है। लोगों के पास न जॉबकार्ड है, न काम। जिनके पास जॉबकार्ड था, डेढ़ वर्ष पूर्व जमा करा लिया गया। पेंशन से वंचित विधवा सविता के लिए बच्चे पालना मुश्किल है। विधवा सनकेशिया का दर्द है, आगे-पीछे कोई नहीं। बकरियां पालकर घर का खर्च चलाती हैं। इन्हे शौचालय तक का लाभ नहीं मिला।
कैसा सौभाग्य, यहां ढिबरी ही है
गांव की मंजू, आंधी, सुनैना, अकली, जोन्हियां बताती हैं कि गांव में बिजली तो है। सुना भी है कि गरीबों के लिए नि:शुल्क कनेक्शन (सौभाग्य)की योजना है, लेकिन मुसहर बस्ती को वह भी नसीब नहीं है। यहां तो ढिबरी का ही उजाला है।
सूची दे दी, आवास का पता नहीं
प्रधान वीरेंद्र यादव बताते हैं कि 60 मुसहर परिवारों में शौचालय बनवाए गए। आंगनबाड़ी केंद्र भी खोला गया। आवास के लिए 24 पात्रों की सूची ब्लॉक मुख्यालय को सौंपी गई है, आगे का पता नहीं। वे मानते हैं पूर्व में हुई लापरवाही से यहां विकास नहीं हुआ है। वह वंचितों को लाभ दिलाने का प्रयास कर रहे हैं।
पात्र मुसहरों को योजनाओं का लाभ न मिलना गंभीर प्रकरण है। वंचितों को लाभ देने के निर्देश दे दिए हैं। इसके बाद भी पात्रों तक योजनाएं नहीं पहुंचीं तो जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई होगी।
डॉ. अनिल कुमार सिंह, डीएम, कुशीनगर