जान जोखिम में डाल वन कर्मी डंडे के सहारे पकड़ते हैं बाघ
न संसाधन हैं और न ही प्रशिक्षित कर्मी
अमर उजाला ब्यूरो
खड्डा। क्षेत्रीय वन कार्यालय खड्डा संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। पड़ोस में स्थित जंगलों से निकल कर रिहायशी इलाके में पहुंचकर खतरा उत्पन्न करने वाले हिंसक जानवरों के रेस्क्यू के लिए कोई प्रशिक्षित टीम का भी इंतजाम नहीं है। वन अपराधों के रोकथाम के लिए ठोस उपाय नहीं होने से देखभाल भी ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा है। जान जोखिम में डाल कर वन कर्मी डंडे के सहारे बाघ पकड़ने जाते हैं ।
खड्डा वन क्षेत्र की सीमा बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व व महराजगंज जनपद के सोहगीबरवा वन्यजीव अभयारण्य से मिलती है। साथ ही गंडक नदी व इसके उस पार उत्तरी हिस्सा मरचहवा, हरिहरपुर, बसंतपुर शिवपुर, नरायनपुर, शाहपुर, महदेवा आदि गांव तो एकदम सटे हुए हैं। जहां अक्सर जानवर गांव में घुस कर लोगों के लिए खतरा उत्पन्न कर देते हैं। जंगलों से भटक कर बाघ, गैंडा, तेंदुआ, लकड़बग्घा, हिरन, अजगर, मगरमच्छ आदि वन्यजीव खड्डा कस्बा सहित आसपास पहुंचकर लोगों के लिए समस्या पैदा कर देते हैं। ग्रामीण नरेश, सुमित्रा देवी, हीरा कुशवाहा, संतोष यादव, राजन पांडेय, रामप्रताप प्रजापति, मुबारक अली, ओमप्रकाश राय, मार्कंडेय मिश्रा बताते हैं कि छह माह से लगातार जंगली जानवर लोगों व मवेशी पर हमला कर रहे हैं। ऐसे में सुविधाओं से लैस वाहन व नदी के लिए मोटरवोट के साथ प्रशिक्षित टीम की तैनाती क्षेत्रीय कार्यालय में की जानी चाहिए। जिनके पास जानवरों को बेहोश करने व पकड़ने की क्षमता हो, यहां असलहा से लैस गार्ड तैनात होने जरूरी हैं, जो वन अपराधों को रोक सकें। ऐसा नहीं होने से जनता व वन्यजीव तथा वनकर्मी असुरक्षित हैं। पिछले वर्ष गंडक नदी में आई बाढ़ के पानी में नेपाल से लगभग एक दर्जन गैंडा बहकर यूपी, बिहार के सीमावर्ती क्षेत्रों में पहुंच गए थे। इनमें से एक की मौत खड्डा थाना क्षेत्र के हरिहरपुर गांव के पास नदी में हो गई थी। अन्य को बिहार व नेपाल के वनकर्मी हाथी दस्ता के साथ पकड़ कर नेपाल ले गए थे। जंगल से निकले बाघ, गैंडा, हिरण, अजगर, मगरमच्छ आदि जंगल से होकर गुजरने वाली रेल लाइन पर ट्रेनों की चपेट में आकर मर तक जाते हैं। पिछले महीने खड्डा क्षेत्र के बलोचहा गांव में तेंदुआ का शव मिला था। छह माह में खड्डा इलाके में एक दर्जन लोग हिंसक जानवरों के हमले में घायल हो चुके हैं, जबकि दो मवेशी मारे गए हैं। रेंजर खड्डा टीएन तिवारी का कहना है कि यहां संसाधनों का अभाव है। प्रशिक्षित टीम व उपकरण नहीं होने से भटक कर आने वाले जंगली जानवरों से लोगों की सुरक्षा कठिन हो जाती है। डंडा लेकर बाघ खोजना पड़ता है। जिससे खुद की जान संकट में रहती है। समस्याओं से उच्चाधिकारियों को अवगत कराया गया है।