दोआबा की आधी आबादी की सुरक्षा, उत्पीड़न से जुड़े मामलों में उनके बयान लेने की जिम्मेदारी महज 18 महिला पुलिस कर्मियों पर है। ऐसे में महिला आंदोलन और उनसे जुड़े विभिन्न मामलों को नियम ताक पर रखकर पुरुष पुलिस को संभालना पड़ रहा है। स्टाफ की कमी के चलते हिंसा के विभिन्न मामलों में पीड़ित महिलाओं को समय पर न्याय न तक नहीं मिल पा रहा। जिम्मेदार हैं कि आधी आबादी की सुरक्षा और उनकी प्रताड़ना से जुड़े मामलों को लेकर तनिक भी संजीदा नहीं दिख रहे हैं।
शासन द्वारा महिलाओं की सुरक्षा और उनसे जुड़े मामलों का निस्तारण कराने के लिए महिला सिपाही, उपनिरीक्षक और थानाध्यक्ष को जिम्मेदारी सौंप रखी है। न्यायालय ने भी साफ तौर पर आदेश दे रखा है कि महिलाओं के मामलों को महिला सिपाही और उपनिरीक्षक ही निस्तारित करेंगी। लेकिन दोआबा में शासन और न्यायालय का यह आदेश महज कागजी कोरम पूरा करने वाला दिख रहा है। यहां की आधी आबादी की सुरक्षा, उनकी समस्याओं को हल कराने के लिए दस थानों में 12 महिला सिपाहियों की तैनाती की गई है। पइंसा और कौशाम्बी थाना पूरी तरह से महिला सिपाही से महरूम रखे गए हैं।
महिला सिपाही का स्टाफ कम होने की वजह से बलात्कार पीड़िताओं की समय पर डाक्टरी तक नहीं हो पाती। कभी सिपाही नहीं तो कभी अस्पताल से चिकित्सक के गायब रहने का मामला प्रकाश में आता है। ऐसे में पीड़िता को कई दिन तक डाक्टरी परीक्षण के लिए भटकना पड़ता है। यही हाल घरेलू हिंसा जैसे मामलों में देखने को मिलता है। बानगी के तौर पर शुक्रवार को कलक्ट्रेट में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों और सहायिकाओं के प्रदर्शन को लिया जा सकता है। प्रदर्शनकारियों की संख्या अधिक होने के कारण मजबूरन प्रदर्शन स्थल पर छह महिला सिपाहियों के साथ पुरुष पुलिस के जवानों को लगाना पड़ा। हद तो तब हो गई जब महिला कार्यकत्रियों से पुलिस के जवानों की छीना झपटी और धक्का-मुक्की होने लगी। इतना ही नहीं जिले के दर्जनभर थानों में महिलाओं से जुड़ी लगभग डेढ़ सौ विवेचनाएं स्टाफ की कमी के चलते लंबित चल रही हैं।
महिला सिपाही की कमी जिले में काफी दिनों से चली आ रही है। समय-समय पर इसकी मांग भी की जाती है। महिला संगठन के प्रदर्शन, उनके उत्पीड़न से जुड़े मामलों में उपलब्धता के हिसाब से महिला सिपाहियों को लगाया जाता है।
बीके मिश्र, एसपी कौशाम्बी