सिराथू तहसील के बनियन का पुरा (हिसामपुर माढ़ो) गांव के बूढ़े गरीब जगन्नाथ की जिंदगी दर्द से भरी है। जब आज पति-पत्नी दोनों को खुद किसी के सहारे की जरूरत है। तब उन्हें नेत्रहीन बहू-बेटे का सहारा बनने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। कुनबे के निवाले के इंतजाम को बूढ़े दंपति को मेहनत-मजदूरी करनी पड़ रही है। फिर भी दाने-दाने को मोहताज इस वृद्ध को अब तक किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। प्रधान और ब्लाक के अफसर-कर्मियों की मनमानी का आलम यह है कि बेघर, भूमिहीन इस बेबस परिवार को शासन से मिलने वाली योजनाओं से भी वंचित रखा गया है। रोजाना मर-मर कर जी रहे इस गरीब परिवार के हालात से जनप्रतिनिधि भी अनभिज्ञ बने हैं।
हिसामपुर माढ़ो ग्रामसभा का एक मजरा है बनियन का पुरवा। करीब 25 घरों की इस बस्ती में ही एक परिवार जगन्नाथ लोध का भी रहता है। जिसकी जिंदगी बेबसी की बानगी है। इस गरीब परिवार की विड़बना देखिए कि बेटा सुरेंद्र और बहू विमला दोनों नेत्रहीन हैं। ऐसे में जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुके जगन्नाथ और उनकी बूढ़ी पत्नी महरजिया देवी पर ही नेत्रहीन बहू-बेटे और दो साल के मासूम पोते की जिम्मेदारी है। पर, जर्जर हो चुकी काया और बेदम हड्डियों के कारण अब दोनों मजदूरी भी नहीं कर पाते हैं। इसके कारण रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल है। घर के नाम पर झोपड़ी थी। वह भी बारिश की भेंट चढ़ गई। इससे अब यह कुनबा जानलेवा ठंड में खुले असामान के नीचे ठिठुरने को मजबूर है। गांववाले उनकी हालात पर अफसोस तो जाहिर करते हैं। पर, अब तक किसी ने भी आगे बढ़कर इनकी मदद के लिए कोई प्रयास नहीं किया। नेत्रहीन विमला बताती है कि आंखों में रोशनी नहीं होने के कारण वह और उसके पति मेहनत-मजदूरी भी नहीं कर पाते हैं। वहीं उसकी बूढ़ी सास महरजिया देवी ने फफकते हुए बताया कि वह गांववालों के यहां जाकर कुछ कर देती है, तो खाने की व्यवस्था हो जाती है। पर, कभी-कभी ऐसा भी आता है कि पूरे परिवार को भूखे पेट ही सोना पड़ता है।
सिराथू तहसील के बनियन का पुरा (हिसामपुर माढ़ो) गांव का वृद्ध जगन्नाथ और उसका पूरा परिवार दाने-दाने को मोहताज है। उसके इस हालात से गांव-गांव बच्चा-बच्चा वाकिफ भी है। फिर भी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस परिवार को अमीरोंवाला राशनकार्ड बनाकर थमा दिया गया है। मामले में पूछने पर ग्राम प्रधान निर्मला देवी के प्रतिनिधि संतोष सिंह ने यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि उनके कार्यकाल से पूर्व यह राशनकार्ड बना था। सबसे बड़ी समस्या यह है कि यही पीला राशनकार्ड उसे गरीबों को मिलने वाली अन्य योजनाओं से भी वंचित रखे हुए हैं। फिर भी प्रधान समेत गांव के किसी भी व्यक्ति के पास इतनी फुर्सत अथवा मानवीय संवेदना नहीं है, कि उसे बीपीएल परिवार में शमिल कराने का प्रयास करें।