चरवा। कौशाम्बी में आलू के काश्तकार अबकी मौसम की मार से तबाह हो गए हैं। बार-बार हुई बेमौसम बारिश से फसल बर्बाद हुई है। खेतों में उपज पिछले साल से आधी से भी कम है। पैदावार नहीं होने से किसानों की लागत भी नहीं निकल रही है। इससे किसान कर्ज में डूब गए हैं। वे परेशान हैं कि बुआई के आढ़ती अथवा बैंक से लिया कर्ज वे अब कहां से भरेंगे।
रबी के सीजन में कौशाम्बी के किसान आलू की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं। मंझनपुर, सिराथू, कड़ा, मूरतगंज, चायल, नेवादा ब्लाकों के हजारों किसान इस नगदी फसल से मालामाल भी हुए हैं। कृषि विभाग के आंकड़ों पर ही गौर करें तो जिले में आलू का रकबा करीब 30 हजार हेक्टेयर है। किसान बताते हैं कि एक बीघा आलू की बुआई में करीब 30-35 हजार रुपये का खर्च आता है।
इसमें से वे बीज आढ़ती से उधार लेते हैं। जबकि जुताई, खाद, सिंचाई, मजदूरी आदि का इंतजाम मौजूदा पूंजी अथवा केसीसी से ऋण लेकर किया जाता था। किसानों के मुताबिक पिछले पिछले वर्ष प्रति बीघा करीब 50-60 हजार रुपये की आलू पैदा होती थी। इससे उन्हें करीब 25-30 हजार रुपये प्रति बीघे में फायदा आता था। पर, इस साल बार-बार हुई बेमौसम बारिश से आलू की फसल बर्बाद हो गई है। चरवा गांव के किसान कमला कुशवाहा, राम नारायण भारतीय, संजीव पांडेय, राजेंद्र केसरवानी, कपिल उपाध्याय, खुर्द गांव के कमलेश त्रिपाठी, पहाड़पुर गांव के अशोक पांडेय, रायधान का पुरा गांव के अनूप कुमार आदि ने बताया कि बुआई के तीसरे दिन ही हुदहुद तूफान से हुई बारिश के कारण खेतों में पानी भरने से बीज सड़ गए थे। दुबारा बुआई करानी पड़ी थी।
इसके बाद दो बार और भीषण बारिश हुई। इससे फसलें डूब गई थी। जिसके कारण इस बार उपज आधी रही। किसानों ने बताया कि प्रति बीघा 60-65 कुंतल के बजाय 30-32 कुंतल आलू भी नहीं निकल रहा है। इससे लागत ही डूब गई है। आलू बिक्री से मिला पैसा जुताई, खाद, सिंचाई, मजदूरी भर को नहीं है। आढ़ती को बीज की कीमत कहां से देंगे।