कौशाम्बी में गुरु पूर्णिमा ‘आषाढ़ी’ के नाम से जानी जाती है। चने की दाल की पूड़ी और आम खाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। यही वजह है कि पर्व से पहले ही जिले के बाजारों में आम की बड़ी-बड़ी मंडियां सज जाती हैं और बागवानों से लेकर कारोबारियों के चेहरे खिल उठते हैं।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ी के दिन सबसे पहले भगवान को आम का भोग लगाया जाता है और फिर परिवार के सभी सदस्य चने की दाल की पूड़ी के साथ आम का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, इस दिन लगभग हर घर में आम खरीदा जाता है। परंपरा के निर्वहन के लिए लोग अपनी क्षमता के अनुसार आम खरीदकर रिश्तेदारों और परिचितों को भेंट भी करते हैं। कौशाम्बी के कड़ा, दारानगर, फरीदगंज और आसपास के इलाकों में कभी आषाढ़ी के अवसर पर छोटे-छोटे मेले लगते थे। समय के साथ भले ही इसका स्वरूप बदला हो, लेकिन आम खरीदने और इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा आज भी जीवंत है, जो जिले की सांस्कृतिक पहचान का एक मुख्य हिस्सा बन चुकी है। फरीदगंज के बागवान मनीष सहगल बताते हैं कि गुरु पूर्णिमा पर भगवान को भोग लगाने के बाद आम का दान और भेंट देने की परंपरा वर्षों पुरानी है। वहीं, खांचकी माई के मनीष सम्राट का कहना है कि यह रीति उन्हें पूर्वजों से विरासत में मिली है, जिसे पूरा परिवार आज भी पूरी निष्ठा से निभा रहा है। बागवान सरफराज अहमद के अनुसार, चौसा आम 120 से 150 रुपये प्रति किलो और फजली करीब 100 रुपये प्रति किलो बिक रहा है और गुरु पूर्णिमा के दिन इनकी कीमतों में और बढ़ोतरी की संभावना है।
इस दिन गुरु के सम्मान के साथ आम की मिठास रिश्तों में अपनापन घोल देती है। संवाद