फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Kaushambi News: किसानों को धुआं नहीं रुपये दे रही पराली, बन रहा ग्रीन फ्यूल

Sun, 10 May 2026 12:09 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
विज्ञापन
चायल के चौराडीह गांव के खेतों में रखे गए पराली के गटठर
विज्ञापन
जिस धान की पराली से किसानों को केवल धुआं मिलता था उसी से अब उनकी घर बैठे कमाई हो रही है। पराली से अब ग्रीन फ्यूल बन रहा है। दोआबा में किसान अब पराली को जला नहीं रहे हैं बल्कि इसे बेचकर मुनाफा कमा रहे हैं।
विज्ञापन

कौशाम्बी के खेतों में धान कटाई के बाद दिखाई देने वाले विशाल गोल रोल अब सिर्फ कृषि अवशेष नहीं, बल्कि ग्रीन फ्यूल और ऊर्जा क्रांति की नई पहचान बन चुके हैं। चरवा क्षेत्र के बेरूआ और चौराडीह गांवों में इन दिनों बेलिंग मशीनों की आवाज लगातार सुनाई दे रही है।
खेतों से पराली इकट्ठा कर बड़े-बड़े रोल बनाए जा रहे हैं, जिन्हें ट्रकों से बायोमास प्लांटों तक भेजा जा रहा है। वहां इन्हीं सूखे तिनकों से बायोमास प्लेट, ब्रिकेट और औद्योगिक ईंधन तैयार हो रहा है। कई फैक्ट्रियां इसे कोयले के विकल्प के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि सेकेंड जनरेशन एथेनॉल परियोजनाओं में भी इसकी मांग बढ़ी है।
विज्ञापन

1400 से 2200 रुपये प्रति टन मिल रहा दाम
पराली खरीदने वाली कंपनी के मैनेजर सुभाष घोष ने बताया कि किसानों से गुणवत्ता के अनुसार 1400 से 2200 रुपये प्रति टन की दर से पराली खरीदी जा रही है। अब तक दोआबा क्षेत्र के करीब 1800 किसानों से हजारों टन पराली खरीदी जा चुकी है, जिससे किसानों को लाखों रुपये की अतिरिक्त आय हुई है।
पराली का औद्योगिक उपयोग बढ़ने से प्रदूषण कम होगा, मिट्टी की उर्वरता सुरक्षित रहेगी और गांवों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। पराली के रोल तैयार करने, मशीन संचालन, लोडिंग और परिवहन में बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं को काम मिल रहा है। -मनोज कुमार सिंह, कृषि वैज्ञानिक
कंपनियां सीधे खेत से ले जा रहीं पराली
बेरूआ गांव के किसान रामसजीवन पटेल कहते हैं कि, पहले पराली जलाते थे तो सिर्फ धुआं मिलता था, अब वही पराली पैसा दे रही है। चौराडीह के किसान शिव बाबू यादव ने बताया कि कंपनियां सीधे खेत तक पहुंच रही हैं, जिससे खेत जल्दी खाली हो जाते हैं और अगली फसल की तैयारी भी आसान हो गई है।
पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति हो रही कमजोर
कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक मनोज सिंह ने बताया कि पराली जलाने से खेत की ऊपरी सतह में मौजूद लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। उन्होंने कहा कि धुएं से वातावरण प्रदूषित होता है और लोगों को सांस संबंधी बीमारियों का खतरा भी बढ़ता है। पराली जलाने से खेत की नमी खत्म होती है, जिससे अगली फसल की पैदावार पर असर पड़ता है।
ग्रीन फ्यूल से घटेगा प्रदूषण, सस्ता होगा ऊर्जा विकल्प

ग्रीन फ्यूल निर्माता कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर सुभाष घोष ने बताया कि पराली और कृषि अवशेषों से तैयार होने वाला ग्रीन फ्यूल पेट्रोल और डीजल का बेहतर विकल्प बन रहा है। इससे किसानों को फसल अवशेष बेचकर अतिरिक्त आमदनी मिलेगी, वहीं आम लोगों को भी स्वच्छ और अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन उपलब्ध हो सकेगा। उन्होंने कहा कि ग्रीन फ्यूल के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण कम होगा और पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता घटेगी। इसके उत्पादन से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें