नोटबंदी की मार से जिले के सवा दो सौ ईट-भट्ठाें में अभी तक मजदूरों का जत्था नहीं लौटा है। मालिक भी इन्हें बुलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इससे करीब दस हजार से ज्यादा मजदूर प्रभावित चल रहे हैं। यही हाल मनरेगा मजदूरों का है। वह भी काम के इंतजार में घर बैठे हैं।
नोटबंदी की मार मजदूर तबके पर पड़ी है। सबसे बुरा हाल ईट भट्ठा मजदूरों का है। एक माह सीजन पीछे चला गया है। इससे भट्ठा मालिकों को तगड़ा नुकसान हुआ है। इस मार से न तो मजदूर उबर पा रहा है, न ही मालिक। जिले के सवा दो सौ ईट-भट्ठों में दस हजार से ज्यादा मजदूर काम करते हैं। इन मजदूरों के पास फिलहाल काम नहीं है। वह अपने-अपने घरों में बैठे हैं। भट्ठा मालिक करंट एकाउंट से 50 हजार रुपये की ज्यादा रकम न मिलने पर मजदूरों को नहीं बुला रहा है।
मालिकों के सामने संकट है कि यदि वह मजदूरों को बुलाकर पथाई शुरू करा देते हैं तो खुराकी तो उन्हें देना ही पड़ेगा। दिहाड़ी देने की समस्या को यदि वह दरकिनार भी कर दें तो इन मजदूरों की खुराकी के लिए ही उन्हें संघर्ष करना पड़ सकता है। भट्ठा मालिकाें का कहना है कि बैंकों के पास कैश नहीं है। लिमिट खत्म नहीं हो रही है। यदि बैंकों से एकमुश्त रकम मिलने लगे तो वह मजदूर को बुला लें। उधर मजदूर काम न मिलने पर भट्ठा मालिकों को घेरने लगे हैं। भट्ठा मालिक मिस्बाहुल ऐन ने बताया कि अभी दिसंबर के आखिर तक मजदूरों को नहीं बुलाया जा सकता है। स्थिति अभी सामान्य नहीं है। मजदूरों का मामला है, इसलिए वह उनके लिए कोई रिस्क भी नहीं ले सकते हैं।