हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसला मजबूत हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं। सिराथू ब्लॉक के नारा गांव की शमीमा ने इसे सच कर दिखाया है। कभी तलाक के बाद मायके में बोझ समझी जाने वाली शमीमा आज गांव-देहात की अनपढ़ और बेरोजगार महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं।
राष्ट्रीय आजीविका मिशन (एनआरएलएम) में समूह सखी और मनरेगा में महिला मेठ की जिम्मेदारी निभाकर वह सैकड़ों महिलाओं को रोजगार से जोड़ रही हैं।
शमीमा की शादी करीब दस वर्ष पहले अनेढ़ा गांव में हुई थी। शादी के दो साल बाद पति ने तलाक दे दिया, जिसके बाद वह मायके लौट आईं। कोरोना काल में परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ने पर उन्होंने राष्ट्रीय आजीविका मिशन से जुड़ने का फैसला किया।
उन्होंने चेतना महिला स्वयं सहायता समूह का गठन कर महिलाओं के साथ मिलकर मोमबत्ती बनाने का काम शुरू किया। इसके बाद शमीमा ने न केवल अपने गांव बल्कि आसपास के क्षेत्रों की अनपढ़ और बेरोजगार महिलाओं को जागरूक किया।
शीतल, उजाला, उन्नति, नारी शक्ति, तारा, चांद, रानी लक्ष्मीबाई सहित करीब 20 स्वयं सहायता समूहों का गठन कराया। आज इन समूहों से जुड़ी महिलाएं कॉस्मेटिक की दुकान, भैंस पालन, अचार-मुरब्बा निर्माण, ई-रिक्शा संचालन जैसे कार्य कर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं।
सहायक विकास अधिकारी (स्वरोजगार) महेंद्र कुमार ने बताया कि नारा गांव में वर्तमान में 37 स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनमें शमीमा की भूमिका सराहनीय है।