दोआबा में अच्छी शिक्षा के नाम पर स्कूल संचालक अभिभावकों की जेब पर खुलेआम डाका डाल रहे हैं। स्कूलों में छात्र-छात्राओं के, प्रवेश के नाम पर मनमाने तरीके से भारी रकम फीस के तौर पर वसूल की जाती है। धन उगाही के लिए विद्यालय के जिम्मेदार टाई, बेल्ट, ड्रेस और कापी-किताब को जरिया बनाते हैं। महकमे के उच्चाधिकारी बार-बार निर्देश जारी करते हैं पर जिम्मेदारों पर इसका तनिक भी असर नही पड़ता। इसके चलते जिलेभर में यह कारोबार दिन दूना रात चौगुना फल-फूल रहा है।
दोआबा में जुलाई माह का स्कूल संचालकों को बेसब्री से इंतजार रहता है। इस माह में स्कूल संचालक छात्र-छात्राओं के प्रवेश के नाम पर अभिभावकों की जेब पर खुलेआम डाका डालते हैं। इसके लिए स्कूल संचालकों ने बाकायदा सभी सामानों की सूची बना रखा है। इसमें टाई, बेल्ट, ड्रेस, किताब और कापियां शामिल हैं। मौजूदा समय में यह खेल अपने चरम पर है। दोआबा के गांव-गांव और मोहल्लों में नियम-कानून को ताक पर रखकर संचालित इन स्कूलों में अभिभावकों की जेब में खुलेआम डाका डाला जा रहा है। अभिभावक हैं कि वह अपने बच्चे को अच्छी तालीम दिलाने की लालच में इन कारोबारियों के हाथों लुटने को मजबूर हैं।
यह खेल इन दिनाें जिले भर में देखने को मिल रहा है। अकेले नेवादा ब्लॉक क्षेत्र पर नजर डालें तो इलाके में 38 ऐसे विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है। खास बात तो यह है कि इन विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं को परीक्षा पास करने के बाद किसी दूसरे विद्यालय की डिग्री मुहैया कराई जाती है। ऐसा नहीं है कि मामले में शासन गंभीर नहीं है। उच्चाधिकारियों द्वारा जिले के जिम्मेदारों को लगातार ऐसे स्कूलों पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया जाता है लेकिन जिले के जिम्मेदार हैं कि स्कूल संचालकों से सांठगांठ कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं।
कबाड़ वाहनों से रोज होता है परिवहन
दोआबा में मानक को ताक पर रखकर कक्षा एक से जूनियर तक संचालित हो रहे विद्यालयों में छात्रों को लाने व ले जाने के लिए वाहन लगे हैं। इन वाहनों के किराए के नाम पर भी छात्रों के अभिभावकों को प्रति माह छह से सात सौ रुपये देना पड़ता है लेकिन इन वाहनों की स्थिति पर नजर डालें तो वह पूरी तरह से कबाड़ रहते हैं। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भले ही अभिभावक प्रति माह छह से सात सौ रुपये खर्च कर रहे हैं पर उनकी जान पर रोज बनी रहती है।
योग्य शिक्षकों का है टोटा
दोआबा में कक्षा एक से आठ तक की शिक्षा देने के नाम पर जगह-जगह स्कूल खुले हैं। बेहतर शिक्षा के नाम पर इन स्कूलों में छात्रों के अभिभावकों को प्रतिमाह मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है लेकिन यहां पर शिक्षा देने वाले शिक्षकों की डिग्री पर नजर डाली जाय तो शायद ही कोई शिक्षक स्नातक स्तर की डिग्री वाला हो लेकिन बेसिक शिक्षा विभाग के जिम्मेदार शिक्षा के नाम पर चल रहे इस खेल के प्रति कभी ध्यान नहीं देते।
जो विद्यालय चल रहे हैं वह मेरे आने के बाद तो शुरू नहीं हुए। ऐसे कितने विद्यालय हैं इसकी जांच करने का निर्देश एबीएसए को दिया गया है। जो विद्यालय मानक को पूरा नहीं करते होंगे उन्हें बंद कराया जाएगा।
डीएस यादव, बीएसए