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Kaushambi News: तीसरे दिन भी रंगों से सराबोर रहा सरायअकिल कस्बा

Sun, 12 Mar 2023 01:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
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सरायअकिल। नगर पंचायत क्षेत्र में तीसरे दिन शनिवार को जगह-जगह डीजे की धुन पर लोग मस्ती में झूमते नजर आए। कस्बे में सप्ताह भर होली खेलने की परंपरा 200 वर्ष पुरानी है, लेकिन अब इससे बुजुर्गों ने दूरी बना ली है। होली की कमान अब युवाओं ने संभाल ली है।
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जिले में यही एक कस्बा है जहां एक सप्ताह तक होली खेली जाती है। यहां इस परंपरा की शुरूआत ब्रिटिश हुकूमत में जमीदार जालिम सिंह ने की थी। नगर कृष्णा केशरवानी, गोपाल जी केशरवानी, कृष्ण नारायण रस्तोगी, रंजीत गुप्ता आदि का कहना है कि कस्बे में एक सप्ताह तक होली खेली जाती है। लेकिन वक्त के साथ होली खेलने का स्वरूप भी बदल गया है। पहले होली में हर मोहल्ले में भांग, ठंडई, ढोल, मजीरा और झांझ के साथ अबीर गुलाल उड़ाते हुए लोग फाग गाते थे। अब पुरानी परंपरा विलुप्त होती जा रही है। इसी के तहत शनिवार को कस्बे के प्रमुख मोहल्ला फकीराबाद, पटेल चौराहा, भगौतीगंज, चंद्रशेखर पार्क, चावल मण्डी, रामलीला मैदान, मौलवीगंज आदि स्थानों पर साउंड बाक्स, हार्न व फौव्वारा लगाकर गाने की धुन पर लोगों ने होली खेली।

वहीं आधुनिकता के दौर में होली से बुजुर्गों की दूरी दिखी। कस्बे के पूर्व विधायक शिवदानी, होलीलाल केशरवानी, डॉ. भीष्म सिंह, डॉ. करन सिंह, गुलाब अग्रहरि, गुलाब ताम्रकार आदि का कहना है कि मथुरा, काशी, कानपुर के बाद उनके कस्बे में एक सप्ताह होली खेलने की परंपरा है। जिस पर हम लोग गर्व करते हैं और ये परंपरा चलती भी रहे। लेकिन होली खेलने का स्वरूप बदल चुका है। शराब के नशे में कीचड़, गेरू, कपड़ा फाड़ना, बुजुर्गों को सम्मान ना करना ये चिंता का विषय है। बाहर निकालने पर बेतरीके से रंग लगाना व कपड़ा फाड़ देने का डर सताता है।
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व्यापारियों ने भी होली से बनाई दूरी
कस्बे में भले ही परंपरा का निर्वाह किया जा रहा हो, लेकिन अधिकतर व्यापारियों का होली से मोह भंग हो चुका है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि कस्बे में एक सप्ताह होली होती है। ये गौरव की बात है। लेकिन पहले जैसी होली अब नही रह गई है। होली के नाम पर एक सप्ताह तक अभद्रता के साथ हुड़दंग होता है। उनको वर्ष में एक बार इसी बहाने घूमने का मौका मिल जाता है। इसलिए एक सप्ताह तक टूर में चले जाते हैं।


युवाओं ने संभाली होली की कमान
जमींदारों के समय में होली की बागडोर बुजुर्गों के हांथ में थी। आधुनिकता के दौर में बुजुर्गों ने दूरी बनाई तो युवाओं ने परंपरा की बागडोर संभाल ली। कस्बे के अनूप सिंह, अनिल केशरवानी, निखिल केशरवानी, सुनील सोनी, विनय कृष्ण सोनी, संदीप पाठक आदि का कहना है कि होली का त्योहार भाई चारा व सौहार्द को बढ़ाता है। होली में बुजुर्गों की कमी जरूर महसूस होती है। क्योंकि बुजुर्ग समाज के आदर्श व मार्गदर्शक हैं। होली खेलने के दौरान किसी को भी तकलीफ नहीं हो, इस बात का ख्याल रखा जाता है।
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