पीतल के सामानों की औद्योगिक नगरी शमसाबाद को गोद लेने के बाद भी सांसद विनोद सोनकर खोया वजूद वापस नहीं करा सके। गोद लिए जाने के बाद ग्रामीणों में उम्मीद जगी थी कि उनका छिन चुका रोजगार एक बार फिर वापस मिलेगा। मगर तीन साल बीत जाने के बाद एक भी उद्योग स्थापित न होने से ग्रामीणों की रही सही उम्मीद भी खत्म हो गई। अब नौकरी से वंचित ग्रामीण गांव में बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।
शमसाबाद गांव की आबादी 65 सौ के आस-पास है। दो दसक पहले तक गांव पीतल नगरी के रूप में पहचाना जाता था। यहां पर पीतल के बर्तन बनाने के कुल 168 कारखाने संचालित होते थे। इन कारखानों में दिन रात काम करने वाले कारीगर व हजारों की संख्या में मजदूरों को रोजगार मिलता था।
शमसाबाद सहित मलाक पींजरी, तेरहरा, राघोपुर, रामपुर धमावां, बिजलीपुर, करनपुर सौरई गांवों में फैला पीतल उद्योग आधुनिकता के दौर में स्टील के बर्तनों का चलन होने के बाद धीरे-धीरे खत्म होने लगा। आज हालात यह हो गए हैं कि 168 की जगह महज सात कारखाने बचे हैं। वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनी और गांवों को गोद लेकर आदर्श बनाने की पहल शुरू हुई तो ग्रामीणों में पुश्तैनी उद्योग स्थापित होने की उम्मीद जगी।
सांसद विनोद सोनकर ने शमसाबाद गांव को गोद लेने के बाद पीतल उद्योग को वृहद रूप देने का वादा भी ग्रामीणों से किया था। तीन साल बीत जाने के बाद एक भी उद्योग की बढ़ोत्तरी गांव में नहीं हो सकी। इससे ग्रामीणों में बंधी उम्मीद अब धीरे-धीरे खत्म होने लगी है। पुश्तैनी उद्योग से हाथ धो बैठे ग्रामीण युवाओं, कारीगरों को अब बेरोजगारी का दंश भुगतना पड़ रहा है।
सात लोगों ने जगा रखी है उद्योग की अलख
पीतल नगरी के रूप में विख्यात शमसाबाद गांव में उद्योग की निशानी अभी बाकी है। गांव के श्रीबाबू, अरविंद, हरिश्चंद्र, तेजबली, ओम प्रकाश, मनोज कुमार, सुरेश ने आज भी उद्योग को जिंदा कर रखा है। इनका कहना है कि अब उद्योग में पहले वाली बात नहीं रह गई है। बाजार में स्टील के सामान की भरमार होने और मंहगाई के चलते न तो उतनी बिक्री रह गई और न ही मुनाफा। किसी प्रकार धंधे के सहारे गुजर-बसर किया जा रहा है।
मिर्जापुर और कानपुर थे प्रमुख बाजार
पीतला नगरी शमसाबाद के 168 कारखानों में खपने वाले कच्चे माल की आपूर्ति और बने सामानों का निर्यात करने के लिए मिर्जापुर व कानपुर प्रमुख बाजार थे। कारोबारी इन दो प्रमुख बाजारों से आयात-निर्यात का कारोबार कर दो दसक पहले तक तक खुशहाल थे। लेकिन आज गांव में न तो रोजगार रह गया और न ही कारोबार। कुछ नजर आता है तो वह है सिर्फ बेरोजगारी। इसे दूर करने के लिए सांसद विनोद सोनकर ने कमर तो कसी थी पर उन्हें भी पीतल उद्योग स्थापित करा पाने में सफलता नहीं मिल सकी।
दो दशक पहले गांव में बर्तन खरीदने वालों की लंबी लाइन लगती थी। बड़े पैमाने पर पीतल कारखाना होने के बाद लगन के मौसम में सामान मुहैया करा पाना मुश्किल होता था। मगर अब वह बात नहीं है। जिन लोगों ने उद्योग लगा रखा है वे भी कुछ खास कमाई नहीं कर पा रहे हैं।
हरीशंकर, निवासी शमसाबाद
गांव में कुल 168 कारखाने संचालित हो रहे हैं। बाजार में मांग घटने के बाद 95 फीसदी कारखाने बंद हो गएं। सात लोगों ने गांव का नाम जिंदा कर रखा है। सांसद के आश्वासन के बाद कारखानों की संख्या बढ़ने की उम्मीद जगी थी। तीन साल बाद भी कुछ न हो पाने से यह आस भी टूट गई है।
विजय कुमार, शमसाबाद
उद्योग और घर बैठे रोजगार के लिए विख्यात शमसाबाद के लोग आज बेरोजगार हैं। सांसद ने ठप हो चुके कारखानों को चालू कराने का आश्वासन दिया था। तीन साल बीत जाने के बाद अब ग्रामीणों ने उम्मीद छोड़ दी है। गांव का युवा आज बेरोजगारी की मार झेल रहा है।
अरविंद कसेरा, शमसाबाद