नव निर्वाचित सांसद के पिता इंद्रजीत सरोज प्रदेश सरकार में दो बार मंत्री रहे, मंझनपुर सीट से पांचवीं बार चुने गए हैं विधायक
संवाद न्यूज एजेंसी
मंझनपुर। लंदन के क्वीन यूनिवर्सिटी से एकाउंटेंसी से स्नातक की डिग्री हासिल कर सीधे देश की सबसे बड़ी पंचायत तक पहुंचने वाले सपा प्रत्याशी पुष्पेंद्र सरोज की व्यक्तिगत तौर पर कोई राजनीतिक पकड़ नहीं है। सियासत उन्हें विरासत में मिली है। लोकसभा चुनाव में उन्हें इसका भरपूर फायदा मिला। लेकिन उनके सामने चुनौतियां भी होंगी।
एक मार्च 1999 को जन्मे पुष्पेंद्र ने तीन महीने पहले ही उम्र की 25वीं दहलीज पार की है। बचपन से उन्हें घर में राजनीतिक माहौल मिला। क्यों पिता इंद्रजीत सरोज ने 90 के दशक में बसपा से राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी। पहली दफा वर्ष 1997 में वह मंझनपुर विधानसभा से विधायक चुने गए थे। इसके बाद वह 2002, 2007 और 2012 में लगातार चार चार बसपा से ही विधायक निर्वाचित हुए। तत्कालीन मायावती सरकार के दो बार कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं।
2018 में हाथी से उतरकर साइकिल की सवारी करने वाले इंद्रजीत को अनुसूचित जाति का बड़ा चेहरा मानते हुए सपा ने उन्हें राष्ट्रीय महासचिव बनाने के साथ ही वर्ष 2019 में कौशाम्बी लोकसभा से उम्मीदवार बनाया था। लेकिन मोदी लहर में हार गए थे। इसके बाद वर्ष 2022 के चुनाव में इंद्रजीत ने खुद को साबित करते हुए कौशाम्बी जिले भाजपा को क्लीन स्वीप कर दिया था। पांचवीं बार मंझनपुर विधानसभा क्षेत्र से ही सपा के टिकट पर विधायक चुने गए।
सियासी जानकारों का कहना है कि नव निर्वाचित सांसद पुष्पेंद्र को जनाकांक्षाओं का खयाल रखना और राजनीतिक बिसात पर फूंक-फूंककर कदम रखना होगा। स्थानीय समस्याओं को समझना होगा।
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चुकता किया पिता की हार का हिसाब
नामांकन के बाद भाजपा प्रत्याशी विनोद सोनकर ने मीडिया से मुखातिब होते हुए दावा किया था कि पिछली बार पिता को हराया था, इस बार बेटे को हराएंगे। लेकिन, मंगलवार को आए चुनावी नतीजों ने भाजपा प्रत्याशी के दावों की हवा निकाल दी। इसी के साथ ही सपा गठबंधन प्रत्याशी पुष्पेंद्र ने पिछले चुनाव में पिता इंद्रजीत को मिली शिकस्त का हिसाब चुकता कर डाला।