राममूर्ति द्विवेदी ग्राम पंचायत हर्रायपुर
फाल्गुन..मंजीरे की धुन पर ढोलक की थाप, उस पर गाया जाने वाला फाग.. ये सब मोबाइल में सिमट गए। गांव की गलियों में गूंजती देवर-भाभी की हंसी ठिठोली। चौपालों पर बड़े-बुजुर्गों के यादगार मेल-जोल। ठंडाई घोटते लोग। पिचकारी और रंग लेकर घूमती बच्चों की टोलियां।
रंग-बिरंगी होली है, होली है भई होली है, बुरा न मानों होली है..। अब ये गीत और नजारे यादों में रह गए, जो दिखाई और सुनाई नहीं देते। होली का पारंपरिक रंग रूप तेजी से बदला है। डिजिटल युग में फाग, लोकगीत और बच्चों की होली सोशल मीडिया की रील और वीडियो तक सिमट गए हैं।
त्योहारों की पुरातन संस्कृति को बचाए रखना भी जरूरी है। रंग तभी सार्थक हैं, जब वे दिलों को भी प्यार से रंग दे। -रामप्रकाश मिश्रा, एडवोकेट भरवारी।
रंगभरनी एकादशी से लोग टोलियों में ढ़ोलक-मंजीरे के साथ मोहल्लों में फाग गाते थे। अब न वो लोग रहे और न फाग। -राममूर्ति द्विवेदी ,ग्राम पंचायत हर्रायपुर ।
पहले होली राग और द्वेष को दूर करने का त्योहार था, अब लोग बहाने से रंजिश और खुन्नस निकालने लगते हैं। -राजेश सिंह गौतम, भरवारी।
वर्तमान पीढ़ी होली के अनूठे आनंद से वंचित है। पुरानी परंपराओं से दूरी बन गई है। लोग त्योहार का महत्व भूल रहे हैं। -सुधाकर सिंह, भरवारी।