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आधी-अधूरी तैयारी के बीच कोरोना की तीसरी लहर से निपटने की तैयारी

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कोरोना की तीसरी लहर से निपटने के लिए भले ही स्वास्थ्य महकमा तैयारी पूरी होने का दावा कर रहा हो, लेकिन जिले के अस्पतालों का बुरा हाल है। ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में खासतौर पर स्त्री व बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती ही नहीं है। इसके अलावा जिन चिकित्सकों की तैनाती भी वह भी समय से अस्पताल नहीं आते हैं। संक्रमण का खतरा लगातार जिले में बढ़ता जा चुका है। अब तक चार लोग संक्रमित मिल चुके हैं। कोरोना के नए वैरिएंट ओमीक्रॉन की पुष्टि कराने के लिए भेजी गई इनकी जांच रिपोर्ट तक नहीं मिल सकी है। ऐसे हालात में अगर संक्रमण ने तेजी से पांव पसारा तो स्वास्थ्य विभाग उसे काबू करने में हांफ जाएगा। इस बाबत अमर उजाला ने बुधवार को जिले के कुछ प्रमुख अस्पतालों की पड़ताल कराई तो वहां नीम-हकीमों की तर्ज पर ही चिकित्सक मरीजों का इलाज करते देखे गए।
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सरकारी अभिलेख में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नेवादा में 10 स्थाई व 25 संविदा के स्टॉफ नियुक्त हैं। यहां प्रभारी चिकित्साधिकारी डॉ. ललित सिंह के अलावा डॉ. शशांक, डॉ. विजेता, फार्मासिस्ट राजू लाल नियुक्त हैं। बुधवार दोपहर 12 बजे तक यहां सिर्फ संविदा के चिकित्सक डॉ. रमेश अकेले मरीजों का देख रहे हैं। बाकी के चिकित्सक व परमानेंट स्टॉफ नदारत रहा। पूछने पर बताया गया कि प्रभारी डॉ. ललित कुमार सिंह नेवादा ब्लॉक में चायल विधायक संजय गुप्ता के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। यहां रोजाना 80 से सौ लोगों की ओपीडी होती हैं। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर कोई संक्रमित यहां इलाज कराने आए तो वह नीम-हकीमों की तर्ज पर दवा लेकर ही घर लौट जाएगा। इसकी वजह से उसके परिवार व गांव में संक्रमण बढ़ने का खतरा है।
स्थानीय सीएचसी में अल्ट्रासाउंड मशीन रेडियोलॉजिस्ट नहीं होने के कारण धूल खा रही है। 42 बेड के इस अस्पताल में रोजाना करीब दो सौ मरीजों की ओपीडी होती है। कहने को तो यहां पांच चिकित्सक सहित 19 स्थाई स्टॉफ की तैनाती है लेकिन सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ, अस्थि रोग विशेषज्ञ नियुक्त ही नहीं है। अस्पताल में रोजाना करीब 150 मरीजों की ओपीडी हुआ करती है। ऑक्सीजन की व्यवस्था है और रोजाना करीब 160-180 मरीजों की कोविड-19 की जांच होती है। गनमीत है कि यहां अब तक कोरोना संक्रमित नहीं मिला। प्रसव की व्यवस्था होने के कारण तमाम जांच भी होती है। अगर कोई गर्भवती महिला संक्रमित निकली तो उसे जिला अस्पताल रेफर करने के सिवा कोई रास्ता नहीं रहेगा।
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प्रदेश सरकार के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के गृह नगर सिराथू में भी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। यहां चार चिकित्सक नियुक्त हैं। 50 बेड वाले इस अस्पताल में 30 बेड कोरोना संक्रमित के लिए रिजर्व किए गए हैं। यहां भी संविदा के स्टॉफ के भरोसे चिकित्सा व्यवस्था का संचालन किया जा रहा है। पांच सौ लीटर प्रति मि नट उत्पादन का ऑक्सीजन प्लांट तो लगाया गया है लेकिन उसके संचालन के लिए पर्याप्त बिजली नहीं मिल पाती। जेनरेटर की भी भी व्यवस्था नहीं है। एक बार बिजली जाने पर दोबारा प्लांट को चालू होने में कम से कम चार घंटे का वक्त लग जाता है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस अस्पताल में अगर श्वास आदि से पीड़ित मरीज आ जाएं तो उन्हें कैसे ऑक्सीजन मिलेगी।
इनका कहना है
यह बात सही है जिले के सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी है। यह कमी शासन स्तर से ही। फिलहाल जो स्टॉफ है उससे काम चलाया जा रहा है। ऑक्सीजन प्लांटों में जेनरेटर व मानव संसाधन की कमी के कारण जो दिक्कत आ रही हैं उसके बाबत शासन को पत्र लिखा गया है।
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डॉ. हिंद प्रकाश मणि, डिप्टी सीएमओ
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