इस साल आम के रसों का जायका आम आदमी भी ले सकेगा। बागों में बौराए आम के पेड़ों को देख भरपूर उत्पादन के आसार दिख रहे हैं। इसे देख बागवान गदगद हैं। पेड़ों पर लगे बौर से आम की अच्छी पैदावार का अनुमान जानकार लगा रहे है। बौर के मुताबिक फल आए तो बागवानों को जहां भारी मुनाफा होगा वहीं किस्म-किस्म के आम के रसों का जायका आम आदमी भी ले सकेगा।
जिले में लंगड़ा, चौसा, फजली, दशहरी और सफेदा आम की अच्छी बागवानी होती है। ऐसे आमों की बागवानी जिले में डेढ़ सौ हेक्टेयर में फैली हुई है। इसमें सबसे अधिक क्षेत्रफल सिराथू तहसील का कड़ा क्षेत्र है। इन बागों से प्रत्येक वर्ष मौसम की मार व रोग न लगने पर 17 से 18 सौ टन का उत्पादन होता है। इस बार आम के पेड़ों में भरपूर बौर आने से बागवानों के चेहरे खिल उठे हैं। बौर अमियां रोग का शिकार न हो जाए इसे लेकर बागवान अपनी-अपनी बागों की रोज निगहबानी करते हुए पेड़ों को सुरक्षित कर रहे हैं। कड़ा के बागवान हसन अहमद ने बताया कि उनके पास 32 बीघे की बाग है। आम के पेड़ों में भरपूर बौर आए हैं, पैदावार के आसार हैं।
बौर लगने के बाद तने में लगाते हैं लेप
आम के पेड़ में भरपूर बौर लगें, इसके लिए बागवान जहां सल्फर व कीटनाशक का छिड़काव बौर आने से ठीक पहले करते हैं वहीं बौर लगने के बाद भी उनकी देखभाल करनी पड़ती है। देवीगंज के बागवान प्यारे मियां ने बताया कि पेड़ों में बौर लगने के बाद तने पर कापर आक्सीक्लोराइट का लेप लगाया जाता है। इससे कीड़े पेड़ों में नहीं चढ़ पाते। इसके अलावा तने पर ग्रीस का लेप लगाकर पालीथिन बांध दी जाती है। ऐसा करने से कीट पेड़ पर नहीं चढ़ पाते और बौर व फलों को नुकसान से बचाया जा सकता है।
बौर को नष्ट कर देते हैं भुनगे व गुम्मा रोग
आम की बागवानी में जरा सी चूक उत्पादन को निचले स्तर पर लाकर खड़ा कर देती है। कड़ा के बागवान मकबूल हसन का कहना है कि बौर लगने के बाद सबसे अधिक खतरा भुनगे का होता है। जिस बाग में छोटे-छोटे मच्छरों की तरह के कीड़े बौर पर मंडराने लगते हैं उनमें गुम्मा रोग का प्रभाव होना तय है। इस रोग के लगने के बाद बौर में एक भी फल नहीं आते और कुछ दिन बात वह नष्ट हो जाता है। इससे बचाने के लिए समय-समय पर बौर में कीटनाशक का छिड़काव जरूरी रहता है।
इलाहाबाद व वाराणसी है प्रमुख मंडी
जिले में होने वाले आम उत्पादन की खपत इलाहाबाद के अलावा वाराणसी की मंडी में होती है। व्यापारी पहले तो बागवान से पूरी की पूरी बाग का सौदा फल देखकर कर लेते हैं। यदि किसी बागवान की बाग का सौदा व्यापारियों से नहीं हुआ तो वह अपना उत्पादन इलाहाबाद व वाराणसी की मंडी में बेचता है। बागवान हसन अहमद का कहना है कि वाराणसी ले जाने में इलाहाबाद के सापेक्ष अधिक फायदा होता है। फल अच्छे होने की वजह से बेचने में कोई कठिनाई नहीं होती।
जिले में आम की बाग लगभग डेढ़ सौ हेक्टेयर क्षेत्रफल में है। आम की बागवानी से किसानों को अच्छा लाभ होता है। जिले में औसतन 17 से 18 सौ टन आम का उत्पादन प्रतिवर्ष इलाहाबाद व वाराणसी मंडी भेजा जात है।
मेवाराम, प्रभारी डीएचओ, कौशाम्बी