ज्येष्ठ अमावस्या को गंगा स्नान व वटवृक्ष की पूजा की परंपरा पौराणिक है। शनिवार को अमावस्या पर महिलाएं गंगा स्नान उपरांत वटवृक्ष की विधिविधान से पूजा व अर्चना की। मानना है कि वटवृक्ष शिव स्वरूप है जिनके पूजन से पति को लंबी उम्र व उसके यशस्वी होने का वरदान प्राप्त होता है।
इसे सावित्री व्रत के नाम से भी जाना जाता है। पैराणिक ग्रंथाें के अनुसार मानना है कि शादी के बाद जब सावित्री को पता चला कि उनके पति का जीवन अल्प है। इस बात को जानकर सावित्री ने वटवृक्ष का पूजन शुरू कर दिया और उसी वटवृक्ष से उसे यमराज द्वारा दीर्घायु का वरदान प्राप्त हुआ तभी से इस सावित्री व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
उधर वटवृक्ष में सूत्र बांधने का जहां धार्मिक महत्व है वहीं वैज्ञानिक कारण भी है जो हमारे जीवन को विशेष प्रभावित करते हैं। बताते है कि वटवृक्ष के तने में रहने वाली सुप्त तरंगें जिसे धार्मिक रूप से शिवतत्व के रूप में जानते है उसे आकर्षित कर वायुमंडल में प्रक्षेपित करती है। ऐसे में तने में सुप्त तरंगों से धागे के लपेटने के दौरान विशेष उर्जा प्राप्त होता है। जिसका हमारे जीवन में विशेष प्रभाव है। आदि काल से शुरू हुई यह परंपरा को आज भी महिलाओं ने जीवंत किया है।