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भारत-पाक युद्ध में शहीद लांसनायक की छीनी जमीन

Sat, 26 Aug 2017 01:23 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
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वर्ष 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में शहीद हुए लांसनायक बच्चूलाल यादव के परिजनों के साथ प्रशासन ने भद्दा मजाक किया है। तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी के संवेदना पत्र पर 1972 में चायल के जलालपुर शाना गांव में शहीद के परिजनों को दस बीघा जमीन मिली थी। जिसे चकबंदी अधिकारी ने हाल ही में खारिज कर दिया। शहीद के दो बेटे फौज में हैं। खारिज जमीन के बदले भूमि मांगी तो उन्हें अपात्र और और फौज में होने की बात कहकर मना कर दिया गया। शहीद पिता के नाम पर मिली भूमि के लिए फौजी बेटे अब प्रशासन से जंग लड़ने को मजबूर हैं।
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चायल के जलालपुर शाना निवासी बच्चूलाल यादव फौज में लांसनायक  थे। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान वह मोर्चे पर थे। 14 दिसंबर को युद्ध के दौरान बच्चूलाल यादव शहीद हो गए थे। वह जब देश के लिए शहीद हुए थे तब उनके बेटे मासूम थे। बड़ा बेटा राजेंद्र कुमार छह वर्ष, मझला बेटा कृष्ण कुमार चार और सबसे छोटा राजकुमार दो वर्ष का था। सबसे बड़ी बेटी आठ वर्ष की गमला देवी थी। पति के शहीद होने पर पत्नी केला देवी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था। वह पति के वियोग में बेसुध रहती थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने 1972 में प्रशासन को संवेदना पत्र भेजकर शहीद के परिजनों को दस बीघा भूमि देने का निर्देश दिया था। जिसके आधार पर भूमि प्रबंधक समिति द्वारा 132 के तहत दस बीघा भूमि का पट्टा दिया। इसी भूमि से शहीद के परिजनों की रोजी-रोटी चलती थी। बेटे जवान हुए तो उनमें भी पिता की तरह फौजी बनने का जुनून सवार हुआ। नतीजतन राजेंद्र कुमार और कृष्ण कुमार फौज में भर्ती हुए। मौजूदा समय राजेंद्र अम्बाला में और कृष्ण कुमार लखनऊ कैंट एरिया में तैनात है।
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शहीद को मिली जमीन लगभग आठ महीने पहले चकबंदी अधिकारी ने खारिज कर दी। हवाला दिया कि जिस भूमि का शहीद के आश्रितों को पट्टा मिला था वह तालाब व शमशान भूमि थी। शहीद के परिजनों का कहना था कि उन्हें मालूम ही नहीं था कि भूमि कहां दी गई। कब्जा मिला उन्होंने जोतना बोना शुरू कर दिया। यदि अब प्रशासन ने भूमि खारिज की है तो उन्हें दूसरी जमीन दी जाए। इसके लिए छोटे बेटे राजकुमार यादव ने दोबारा आवेदन भी किया लेकिन अब तहसील प्रशासन का कहना है कि शहीद के दो बेटे फौज में हैं। छोटा बेटा काश्तकार है और उसकी पत्नी अध्यापक है। इसलिए वे पट्टे के लिए पात्र नहीं हैं। इससे फौजी तिलमिलाए हैं। उन्होंने रक्षा मंत्रालय समेत गृह मंत्रालय से गुहार लगाई है।
 
 
45 साल बाद आश्रितों को पढ़ाया जा रहा नियम कानून
भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए लांसनायक बच्चू लाल यादव के परिजनों को 45 साल बाद तहसील प्रशासन राजस्व विभाग का नियम बता रहा है। लेखपाल की रिपोर्ट भी हास्यास्पद है। लेखपाल ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि बच्चू लाल यादव के शहीद होने पर उनके आश्रितों को दस बीघे जमीन का पट्टा मिला था लेकिन अब उनके बेटों को पट्टा नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि दो बेटे फौज में और छोटा बेटा काश्तकार है। उसकी पत्नी शिक्षक है। इसी तथ्य के आधार पर लेखपाल ने दोबारा हुए आवेदन को खारिज कर दिया है। इसे आंख मूंदकर अधिकारियों ने भी आगे बढ़ा दिया। बच्चूलाल की शहादत को लेकर किसी की भी इस मामले में कलम नहीं कांपी।
 

 
‘चकबंदी के दौरान शहीद के आश्रितों की भूमि तालाब व शमसान की भूमि पर निकली। उसे खारिज किया गया। नवैयत दुरुस्त करना ही हमारा काम है। तहसील प्रशासन आश्रितों को उतनी ही भूमि का पट्टा ऊसर, बंजर व नवीन परती की भूमि पर दे सकता है। यह शहीद के परिजनों का अधिकार है और उनका हक है। शहीदों के आश्रितों को वरीयता पर उतनी भूमि मिलनी चाहिए।’
विजय प्रताप सिंह
चकबंदी अधिकारी (प्रथम)


‘हम पट्टा नहीं दे सकते हैं। जिस वक्त शहीद के आश्रितों को पट्टा दिया गया, वह प्रक्रिया गलत थी, अब चकबंदी विभाग ने इसे खारिज कर दिया है। आवेदक कोर्ट में जाकर अपने हक की लड़ाई लड़ें तब संभव है। पट्टा देने के लिए हमारे पास भूमि भी नहीं है।’
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अश्वनी श्रीवास्तव
एसडीएम, चायल
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