जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर नीले झंडे की खामोशी से सदस्य बेचैन हैं। बसपा की ओर से प्रत्याशी नहीं घोषित होने से समाजवादी प्रत्याशी के लिए राह आसान बनती नजर आने लगी है। इसकी वजह से वोट के नाम पर सदस्यों के मोलभाव में ग्रहण लगा है। यदि ऐसा ही रहा, तो चुनाव लड़कर जिला पंचायत सदस्य बनने वालों के सारे अरमानों पर पानी फिर जाएगा।
बसपा का गढ़ माने जाने जाने वाले कौशाम्बी में इन दिनों हाथी की चाल एकदम सुस्त पड़ी है। जिस जिला पंचायत के अध्यक्ष पद पर पार्टी की शानदार जीत होती रही है। उसी पंचायत की सबसे बड़ी कुर्सी को लेकर बसपा की राजनीति इस बार भंवर में उलझी हुई है। जिला पंचायत के 29 सदस्यों में से पार्टी के पास 11 सदस्य हैं। इसके बाद भी अब तक बसपा की ओर से अब तक कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा जा सका है। सियासी गलियारे में जिन एक-दो नामों की चर्चा भी थी। वे भी खामोश बने हैं। कानाफूसी है कि पार्टी अपने जिन दिग्गजों को प्रत्याशी बनाना चाहती है। वे खुद ही इस चुनाव को सत्तापक्ष का मानकर मैदान में उतरने का साहस नहीं दिखा पा रहे हैं।
विपक्षी खेमे की इस धारणा से सपा प्रत्याशी के सामने कुर्सी पर कब्जे को लेकर आने वाली मुश्किलें दम तोड़ती दिखने लगी हैं। जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर अबकी कौशाम्बी में जैसा सियासी माहौल पैदा हुआ है। उससे सपा प्रत्याशी के टिकट का विरोध करने वालों की भी हवा निकलती दिख रही है। इधर, बसपा की खामोशी, उसके उम्मीदवार की घोषणा नहीं होने से सबसे ज्यादा बेचैन जिला पंचायत सदस्य हैं। उन्हें सपा, बसपा के प्रत्याशी की ओर से बड़े फायदे की उम्मीद थी, लेकिन नीले झंडे की अब तक बनी खामोशी से कोई भी प्रत्याशी इन सदस्यों को कोई भाव नहीं दे रहा है।